Russian Oil: भारत को मिलेगी बड़ी राहत, लेकिन जेब होगी ढीली! जानें क्या होंगे इसके मायने

Lucknow Focus News Desk: पश्चिम एशिया में जारी ईरान संकट और यूक्रेन युद्ध के बीच वैश्विक ऊर्जा बाजार से भारत के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण और दोतरफा असर वाली खबर आ रही है। दुनिया भर में कच्चे तेल की आसमान छूती कीमतों और आपूर्ति के संकट से निपटने के लिए अमेरिका ने रूसी कच्चे तेल (Russian Oil) की खरीद पर मिलने वाली प्रतिबंधों की छूट को एक महीने के लिए और बढ़ा दिया है।
अमेरिकी वित्त विभाग (US Treasury Department) के इस कदम से भारत समेत अन्य एशियाई देशों को समुद्र में फंसे करोड़ों बैरल रूसी तेल को खरीदने का कानूनी रास्ता मिल गया है। हालांकि, इस बार पेंच यह है कि भारत को इस तेल के लिए पहले के मुकाबले बहुत ऊंची कीमत चुकानी होगी।
महंगा हुआ रूस का तेल: घट गया ‘डिस्काउंट’ का अंतर
ईरान-अमेरिका संकट शुरू होने के बाद से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के समीकरण पूरी तरह बदल गए हैं। रूस का जो तेल भारत को भारी छूट (Discount) पर मिलता था, अब वह भी ब्रेंट क्रूड की कीमतों के करीब पहुंच चुका है:
करंट मार्केट रेट: मंगलवार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) 110 डॉलर प्रति बैरल पर था, जबकि रूस का उराल क्रूड (Urals) 101-102 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था।
सिर्फ 8 डॉलर का अंतर: वर्तमान में रूसी तेल और ब्रेंट क्रूड के बीच का अंतर घटकर महज 8 डॉलर प्रति बैरल रह गया है।
फरवरी का हाल (युद्ध से पहले): फरवरी में स्थिति एकदम अलग थी; तब रूसी उराल महज 55 डॉलर और ब्रेंट क्रूड 70 डॉलर के आसपास था, यानी तब भारत को सीधा 15 डॉलर प्रति बैरल का बंपर डिस्काउंट मिल रहा था। साफ है कि रूसी तेल बाजार में आएगा तो सही, लेकिन अब यह पहले जैसा सस्ता नहीं रहेगा।
समुद्र में तैर रहा है 12.4 करोड़ बैरल तेल, पर संकट बरकरार
अमेरिकी दस्तावेजों के मुताबिक, यह अल्पकालिक छूट केवल उन रूसी पेट्रोलियम उत्पादों पर लागू होगी जो इस समय जहाजों (टैंकरों) पर लादे जा चुके हैं। वर्तमान में दुनिया भर के समुद्रों में करीब 12.4 करोड़ बैरल रूसी तेल तैर रहा है और इस तेल को खरीदने की सबसे ज्यादा संभावना भारत और चीन जैसे एशियाई देशों की है।
एक दिन की मांग से भी कम है बैकअप
डच बैंक आईएनजी (ING) में कमोडिटीज स्ट्रेटेजी के हेड वारेन पैटरसन का कहना है कि अमेरिका के इस कदम से आपूर्ति की रुकावट की पूरी भरपाई नहीं हो सकती। समुद्र में मौजूद 12.4 करोड़ बैरल तेल, दुनिया की महज एक दिन की वैश्विक मांग (10.4 करोड़ बैरल प्रतिदिन) से थोड़ा ही ज्यादा है। पैटरसन के मुताबिक, “कच्चे तेल के बाजार को स्थिर करने का एकमात्र समाधान यही है कि होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से तेल की आपूर्ति फिर से सुचारू रूप से शुरू हो।”
भारत के लिए इस फैसले के ‘3 बड़े मायने’
- शॉर्ट-टर्म सप्लाई का जोखिम हुआ कम
भारत अपनी जरूरत का 85% से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। समुद्र में फंसे रूसी तेल को खरीदने की अनुमति मिलने से भारतीय रिफाइनरियों के लिए अल्पकालिक आपूर्ति (Short-term Supply) का संकट टल जाएगा और देश में ईंधन का पर्याप्त स्टॉक बना रहेगा।
- पश्चिमी प्रतिबंधों के टकराव से बचाव
यह छूट भारतीय तेल कंपनियों (IOC, HPCL, BPCL) को एक सुरक्षित कानूनी कवच प्रदान करती है। इससे भारतीय रिफाइनरियां पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के नियमों का उल्लंघन किए बिना और किसी कानूनी जोखिम के बिना रूसी तेल का व्यापार जारी रख सकेंगी।
- रूस को नहीं, टैक्स से होगा फायदा
अमेरिकी वित्त विभाग ने स्पष्ट किया है कि इस एक महीने की ढील से रूस को कोई अतिरिक्त वित्तीय लाभ नहीं होने वाला है, क्योंकि मॉस्को अपने ऊर्जा राजस्व का अधिकांश हिस्सा ‘पॉइंट ऑफ एक्सट्रैक्शन’ (जहां से तेल कुओं से निकाला जाता है) पर लगने वाले टैक्स से पहले ही वसूल कर चुका है।




