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विधेयक मंजूरी विवाद: केंद्र ने अनुच्छेद 143 के तहत SC से मांगी सलाह

Lucknow Focus News Desk: तमिलनाडु विधानसभा से पारित विधेयकों को राज्यपाल और राष्ट्रपति की स्वीकृति देने की समय-सीमा निर्धारित करने के सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले के बाद, केंद्र सरकार ने अब राष्ट्रपति के माध्यम से संविधान के अनुच्छेद 143 के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय से राय मांगी है। हालांकि, संविधान विशेषज्ञों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट की राय केवल सलाह मात्र होती है, जो बाध्यकारी नहीं मानी जाती।

क्या है अनुच्छेद 143?

अनुच्छेद 143, भारतीय संविधान का वह प्रावधान है जो राष्ट्रपति को यह अधिकार देता है कि वे किसी भी सार्वजनिक महत्व के कानूनी प्रश्न पर सुप्रीम कोर्ट से राय मांग सकते हैं। यह परामर्शात्मक अधिकारिता सुप्रीम कोर्ट को प्राप्त विशेषाधिकार है, लेकिन यह राय अनिवार्य रूप से लागू नहीं होती।

अनुच्छेद 143 (1) के तहत भेजे गए संदर्भ पर कोर्ट चाहे तो राय दे सकता है, या राय देने से इंकार भी कर सकता है। साथ ही, सुप्रीम कोर्ट केवल कुछ बिंदुओं पर ही उत्तर देने का विकल्प भी चुन सकता है।

तमिलनाडु बनाम राज्यपाल मामला: क्या है विवाद की जड़?

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक ऐतिहासिक निर्णय में राज्यपालों द्वारा विधेयकों को लंबित रखने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए और यह निर्देश दिया कि ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति को समयबद्ध निर्णय लेना होगा। दो जजों की पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत हस्तक्षेप करते हुए, तमिलनाडु विधानसभा से पारित विधेयकों को मंजूरी दी, जिन्हें राज्यपाल ने रोक रखा था।

हालांकि, इस फैसले पर कई कानूनी विशेषज्ञों ने सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि इतना बड़ा संवैधानिक सवाल कम से कम पांच जजों की पीठ के समक्ष आना चाहिए था। इसके अलावा, संविधान में राज्यपाल द्वारा विधेयक को लंबित रखने की कोई समय-सीमा नहीं दी गई है, इसलिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा समयसीमा तय करना न्यायिक अतिक्रमण माना जा सकता है।

केंद्र सरकार ने राष्ट्रपति के माध्यम से भेजे 14 बिंदु

इस फैसले के बाद, केंद्र सरकार ने 14 सवालों वाला एक संदर्भ सुप्रीम कोर्ट को भेजा, जिन पर संवैधानिक राय मांगी गई है। कोर्ट इस संदर्भ पर अपने विवेक से प्रतिक्रिया देगा, लेकिन इसका असर पहले दिए गए फैसले पर नहीं पड़ेगा। यानी सरकार के पास पुनर्विचार याचिका दाखिल करना ही अधिक उपयुक्त रास्ता है।

सुप्रीम कोर्ट पूर्व में कह चुका है कि अगर किसी निर्णय पर आपत्ति है तो उसके लिए अनुच्छेद 137 के तहत रिव्यू पिटीशन (पुनर्विचार याचिका) दाखिल की जानी चाहिए, न कि अनुच्छेद 143 के तहत राय मांगी जाए।

इतिहास में कब-कब सुप्रीम कोर्ट ने राय दी या इंकार किया?

  • 1951: दिल्ली लॉज एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट ने अपनी राय दी थी।
  • 1957: केरल शैक्षणिक बिल पर भी राय दी गई थी।
  • 1993: कावेरी जल विवाद में राय देने से इंकार कर दिया गया।
  • 2002: गुजरात चुनाव मामले में सुप्रीम कोर्ट ने राय देने को संवैधानिक रूप से अनुचित विकल्प बताया था।

अयोध्या (इस्माईल फारूकी मामला): बाबरी मस्जिद से जुड़े संदर्भ पर सुप्रीम कोर्ट ने राय देने से मना किया, यह कहते हुए कि ऐतिहासिक और धार्मिक विषय अनुच्छेद 143 के अंतर्गत नहीं आते।

क्या कहता है केशवानंद भारती का फैसला?

केशवानंद भारती केस, जो भारतीय संविधान की मूल संरचना सिद्धांत को परिभाषित करता है, उसमें स्पष्ट किया गया कि सुप्रीम कोर्ट को कानून बनाने या संविधान में संशोधन करने का अधिकार नहीं है। सुप्रीम कोर्ट सिर्फ संविधान की व्याख्या कर सकता है, नए प्रावधान गढ़ नहीं सकता। यही तर्क इस मामले में भी लागू होता है, जहां जजों ने समय-सीमा तय कर दी जो संविधान में उल्लेखित नहीं है।

अगर सुप्रीम कोर्ट राष्ट्रपति के भेजे गए 14 बिंदुओं पर राय देता भी है, तो वह फैसला नहीं, महज एक सलाह होगी। इससे न तो कोर्ट के पहले दिए गए फैसले में संशोधन होगा, और न ही सरकार की स्थिति मजबूत होगी जब तक कि वह पुनर्विचार याचिका दाखिल न करे या संसद के जरिये विधायी प्रक्रिया से स्थिति स्पष्ट न करे।

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