बिजनेस

‘डरें नहीं, डटे रहें’, बिजली कर्मचारियों ने छेड़ा बड़ा आंदोलन, कर्मचारी बोले- हम नहीं झुकेंगे

Lucknow Focus News Desk: उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा पूर्वांचल और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगमों के निजीकरण की योजना के खिलाफ कर्मचारियों और यूनियनों का विरोध तेज हो गया है। आंदोलनकारियों का आरोप है कि यह निर्णय कर्मचारियों के हितों के साथ-साथ प्रदेश की सार्वजनिक संपत्तियों पर भी सीधा हमला है।

पूर्वांचल और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगमों में वर्तमान में 7 मुख्य अभियंता स्तर, 25 मुख्य अभियंता द्वितीय, 109 अधीक्षण अभियंता, 362 अधिशासी अभियंता, 1061 सहायक अभियंता, 2154 अवर अभियंता और 23,818 तकनीशियन, लिपिक व अन्य कर्मचारी कार्यरत हैं। इसके अतिरिक्त करीब 50,000 संविदा कर्मी भी कार्यरत हैं। कर्मचारियों का कहना है कि निजीकरण की मार सबसे अधिक संविदा कर्मियों पर पड़ेगी।

सरकार के प्रस्तावों के अनुसार कर्मचारियों को तीन विकल्प दिए गए हैं: वर्तमान स्थान पर बने रहना, अन्य वितरण कंपनियों में स्थानांतरण या स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजना (VRS) को स्वीकार करना। आंदोलनकारियों का मानना है कि इन विकल्पों से कर्मचारियों के हित बुरी तरह प्रभावित होंगे।

सरकार का तर्क है कि निजीकरण से लाइन हानियों को कम किया जाएगा, लेकिन रिपोर्टों के अनुसार ओडिशा में टाटा पावर के अधीन वितरण क्षेत्रों में लाइन हानियां 20% से अधिक बनी हुई हैं, जबकि यूपी पावर कॉर्पोरेशन में यह मात्र 19% है।

प्रदर्शनकारियों ने लगाया ये आरोप

आंदोलनकारियों ने आरोप लगाया है कि निजीकरण के जरिए सरकार जनता के पैसे से चल रही योजनाओं को मुफ्त में निजी कंपनियों को सौंप रही है। पूर्वांचल और दक्षिणांचल निगमों में 42,968 करोड़ रुपये की आरडीएसएस योजना के तहत और 2,394 करोड़ रुपये के बिजनेस प्लान के तहत सरकारी परियोजनाएं चल रही हैं।

इतिहास का हवाला देते हुए, यूनियन नेताओं ने बताया कि 2010 में आगरा विद्युत वितरण को टोरंट पावर को सौंपने में सरकार को करोड़ों का घाटा हुआ था, जिसकी पुष्टि CAG रिपोर्ट में हुई थी।

विपक्षियों का आरोप है कि भाजपा सरकार में बार-बार बिजली के निजीकरण को बढ़ावा दिया गया है। 2003 में विद्युत अधिनियम लाकर निजी क्षेत्र के लिए रास्ता खोला गया और अब विद्युत संशोधन विधेयक 2022 के जरिए सब्सिडी को भी समाप्त किया जा रहा है, जिससे किसानों को सिंचाई के लिए भारी भरकम बिल चुकाने पड़ सकते हैं।

आंदोलन के दौरान कई नेताओं पर FIR दर्ज

सरकार के इस फैसले के विरोध में दिसंबर 2022 और मार्च 2023 में कर्मचारियों द्वारा किए गए आंदोलनों को दबाने के आरोप भी लगाए गए हैं। आंदोलन के दौरान कई नेताओं पर FIR दर्ज की गई, वेतन और पेंशन में कटौती की गई, कई कर्मचारियों को सस्पेंड कर दिया गया और करीब 4,000 संविदा श्रमिकों को कार्यमुक्त किया गया।

इसके बावजूद, कर्मचारियों ने उद्योग और जनता के हितों के लिए संघर्ष जारी रखने की घोषणा की है और नागरिक समाज से समर्थन की अपील की है। ‘डरें नहीं, डटे रहें,’ के नारों के साथ कर्मचारी संगठनों का मानना है कि यह मुद्दा आने वाले समय में उत्तर प्रदेश में एक बड़े राजनीतिक आंदोलन का केंद्र बन सकता है।

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