जमीन से जुड़ा विज्ञान
श्वेता त्रिपाठी
जब खेती को केवल मिट्टी, हल और बीज तक सीमित समझा जाता है, तब कुछ लोग ऐसे होते हैं जो उस सोच की सीमाएं तोड़ते हैं। जितेंद्र कुमार सिंह ऐसे ही एक व्यक्ति हैं जिन्होंने खेती को विज्ञान के साथ जोड़ा, नवाचार के साथ बुना, और किसानों के सपनों से सजाया।
जितेंद्र कुमार सिंह कोई आम भारतीय किसान नहीं हैं। वह लखनऊ में रहते हैं और एक प्रशिक्षित खाद्य तकनीकी विशेषज्ञ हैं, जिन्होंने प्रयोगशाला में जीवन का काफी समय व्यतीत किया है, पर असली प्रयोग उन्होंने खेतों में किए। इसी कड़ी में सामान्य सी मानी जाने वाली मशरूम की खेती को विकल्प’ की तरह पेश किया जिसमें कम जमीन, उन्होंने भारत के छोटे किसानों के लिए एक ‘स्मार्ट कम पानी, लेकिन भरपूर लाभ हो।
मशरूम से आत्मनिर्भरता तक
उनकी कहानी केवल उत्पादन की नहीं, परिवर्तन उसे एक उद्यम बना दिया। गाँव की महिलाएं जो पहले की है। उन्होंने मशरूम को सब्जी भर नहीं रहने दिया, रसोई तक सीमित थीं, अब उनकी ट्रेनिंग से अपने उत्पाद ब्रांड के नाम से बेच रही हैं। जितेंद्र कहते हैं- “मशरूम उगाना सिखाना आसान है, लेकिन आत्मविश्वास बोना सबसे जरूरी है।”
जब उन्होंने औषधीय मशरूम ‘कॉर्डिसेप्स’ की भारतीय प्रयोगशाला में खेती शुरू की, तो बहुतों को यह असंभव लगा। पर आज यह मशरूम भारत में भी उगाया जा रहा है। और उसकी कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में लाखों रुपये प्रति किलो है। यह साबित करता है कि विज्ञान जब स्थानीय अनुभव से जुड़ता है, तो चमत्कार होते हैं।
शहर से गाँव की ओर
आज जितेंद्र सिंह गांव-गांव जाकर लोगों को प्रशिक्षण देते हैं। वे किसी बड़े कॉर्पोरेट संस्थान के प्रचारक नहीं हैं, न ही सरकारी नीति के मुखपत्र । वे जमीन से निकले, जमीन के लिए काम कर रहे हैं। उन्होंने साबित किया कि विज्ञान सिर्फ शहरों की बपौती नहीं है, गाँव भी प्रयोगशाला बन सकते हैं।
एक शिक्षक, एक प्रेरणा
जितेंद्र कुमार सिंह को देखकर लगता है कि असली ‘एजुकेटर’ वही है, जो पढ़ाता नहीं, प्रेरित करता है। उनके प्रशिक्षण कार्यक्रमों में तकनीक के साथ जीवन के सबक भी मिलते हैं। जैसे वे कहते हैं “खेती सिर्फ फसल उगाना नहीं, खुद को पहचानना है।”
यह है मशरूम का इतिहास है
जब हम मशरूम की बात करते हैं, तो हमारे सामने एक ऐसी वस्तु आती है जो दिखने में भले ही साधारण हो, पर इसका इतिहास और महत्व अत्यंत विलक्षण है। मशरूम केवल स्वाद का हिस्सा नहीं, बल्कि यह संस्कृति, स्वास्थ्य, विज्ञान और आजीविका से गहराई से जुड़ा हुआ है।
मशरूम का प्रयोग मानव सभ्यता में हजारों वर्षों से होता आया है। मिस्र की प्राचीन सभ्यता में मशरूम को ‘अमरत्व का पौधा” कहा जाता था। उस समय यह केवल फिरौन के लिए आरक्षित होता था, क्योंकि माना जाता था कि यह ईश्वर की ओर से दिया गया एक दिव्य उपहार है। दूसरी ओर चीन में मशरूम का प्रयोग पारंपरिक चिकित्सा में किया जाता रहा है। चीनी ग्रंथों
में रेइशी और शीटाके जैसे मशरूमों को दीर्घायु और रोग निवारण के लिए अमूल्य बताया गया है। यूरोप में ग्रीक और रोमन सभ्यताओं में मशरूम को शक्ति और सौभाग्य से जोड़ा गया। योद्धा युद्ध से पहले मशरूम खाते थे और इसे ‘देवताओं का भोजन’ कहा जाता था।
हालांकि उस दौर में जहरीले और खाद्य महरूम की पहचान कठिन थी, इसलिए कई बार इसके सेवन से जान भी गई। फिर भी मशरूम धीरे-धीरे यूरोप के खानपान और संस्कृति का हिस्सा बनता गया। 17वीं-18वीं शताब्दी में फ्रांस और इंग्लैंड में वैज्ञानिक स्तर पर मशरूम की खेती शुरू हुई। फ्रांस की गुफाओं और तहखानों में पहली बार इसे व्यवस्थित रूप से उगाया गया। मशरूम उत्पादन की यह प्रणाली बाद में दुनिया के अन्य हिस्सों में फैली और फ्रांस को आधुनिक मशरूम खेती का जनक माना जाने लगा।
भारत में मशरूम की व्यवस्थित खेती 1960 के दशक में शुरू हुई। 1970 में हिमाचल प्रदेश के सोलन में राष्ट्रीय मशरूम अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केंद्र की स्थापना के साथ इस क्षेत्र में गंभीर अनुसंधान और प्रशिक्षण का दौर शुरू हुआ। शुरू में केवल बटन मशरूम ही उगाया जाता था, लेकिन अब ऑयस्टर, मिल्की और दवा में प्रयुक्त कॉर्डिसेप्स जैसी किस्में भी भारत में सफलता से उगाई जा रही हैं।
कुकुरमुता और मशरूम
कुकुरमुत्ता और मशरूम, दोनों ही एक जैसे दिखते हैं और एक ही जैववर्ग फंजाई के अंतर्गत आते हैं, लेकिन इनके बीच फर्क को समझना बेहद जरूरी है। अक्सर गांवों और कस्बों में बारिश के मौसम में जब मिट्टी, गोबर या गीली लकड़ियों पर सफेद या भूरे रंग की छतरियां उग आती हैं, तो लोग इन्हें कुकुरमुत्ता कहकर पहचानते हैं। कई बार इन्हें तोड़कर लोग खाना बना लेते हैं, लेकिन यह हमेशा सुरक्षित नहीं होता।
कुकुरमुत्ता दरअसल जंगली और स्वतः उगने वाली – मशरूम की एक श्रेणी है, जिसकी प्रजातियां अलग- अलग होती हैं। इनमें से कुछ खाने योग्य होती हैं, तो कई अत्यंत जहरीली होती हैं। जहरीले कुकुरमुत्ते का सेवन करने से उल्टी, चक्कर, मस्तिष्क पर असर और कभी-कभी मृत्यु तक हो सकती है। कुकुरमुत्ता पहचानने का कोई सरल देसी तरीका नहीं है, इसलिए इसका सेवन जोखिम भरा माना जाता है।
मशरूम शब्द आज खेती, पोषण और व्यावसायिकता से जुड़ चुका है। जिन मशरूमों की खेती की जाती है जैसे बटन, ऑयस्टर या मिल्की मशरूम, वे पूरी तरह से वैज्ञानिक परीक्षणों और प्रशिक्षण के बाद उगाए जाते हैं। ये न केवल सुरक्षित हैं, बल्कि प्रोटीन, विटामिन और मिनरल से भरपूर हैं। मशरूम की खेती अब रोजगार का माध्यम बन चुकी है और हजारों लोग इससे आत्मनिर्भर हो रहे हैं।




