कविता: मां सदा जीवित रहेंगी…

सच कहे तो, माँ कभी कही नहीं जाती,
क्योंकि उनका अस्तित्व उसके बच्चों के दिलों मे सदैव जीवित रहता है।
माँ झलकती है उनके व्यवहार में —
नम्रता में, दुनियादारी के ढंग में,
धैर्य में, ग़ुस्से में,
वो रहती है उस शांत शक्ति में जिसे वे संजोए रखते हैं।
वो उनकी ईमानदारी में जीवित हैं —
उस सत्य में जिसे वे कभी नहीं तोड़ते,
उन वादों में जिन्हें वे निभाते हैं,
उस सम्मान में जिसे वे बिना देखे भी थामे रहते हैं।
वो उनके आचरण में जीवित हैं —
निःस्वार्थ दया में,
अडिग साहस में,
और उस करुणा में जो कभी थकती नहीं।
उनकी खुशी उनकी हँसी में गूँजती है,
माँ की बुद्धिमता उनके हर निर्णय मे कुछ तो ज़रूर फुसफुसाती है,
उसका प्रेम और ममता आकार देते है उनके जीवन-पथ को।
वो रहती है सदा उनके साथ हमेशा ।
और यद्यपि माँ के हाथ अब उन्हें थामते नहीं,
उनका स्पर्श इस बात में है कि वह बच्चे औरों को कैसे थामते हैं।
यद्यपि माँ अब उनका नाम नहीं पुकारती,
पर माँ के शब्द जीवित हैं , बच्चों के हर अच्छे कर्म में !
उनके चेहरे में, माँ की झलक चमकती है।
उनके जीवन में, माँ की विरासत साँस लेती है।
इसलिए वो कभी दूर नहीं होंगी —
वो उनके रूप में सदा जीवित रहेंगी,
एक अनंत प्रकाश बनकर,
जो उन्हें सदा घर का रास्ता दिखाएगा।
सोनल गधोक



