पहाड़ी राज्यों पर रहम करें वरना वे नहीं बचेंगे
उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर में प्राकृतिक आपदाओं से भारी नुकसान पर कब सोचेंगे?


पिछले महीनों में उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर में बादल फटने और भारी भूस्खलन से सैकड़ों लोग हताहत हुए और खरबों की संपत्ति का नुकसान हुआ। हिमाचल प्रदेश को तो प्राकृतिक आपदा प्रभावित राज्य घोषित करना पड़ा। हिमाचल प्रदेश के अकेले मंडी जिले में बादल फटने की 17 घटनाएं हुईं। इस राज्य में पिछले तीन वर्षों में घटने वाली प्राकृतिक आपदाओं की संख्या सैकड़ा पार कर चुकी है। इसी तरह उत्तराखंड के धराली (उत्तरकाशी), पिथौरागढ़, चमोली और देहरादून में पिछले महीने बादल फटने की घटनाओं से भारी जनधन की हानि हुई। जबकि तीसरे हिमालयी केंद्रशासित राज्य जम्मू-कश्मीर के रामबन, किश्तवाड़, डोडा और जम्मू में भी भारी तबाही हुई।
इन तीन राज्यों में अचानक बढ़ी प्राकृतिक आपदाओं को लेकर दायर की गई एक जनहित याचिका पर सुनवाई करने के दौरान सुप्रीम कोर्ट की वह टिप्पणी काबिलेगौर है, जिसमें उसने कहा-‘अगर हिमाचल प्रदेश में हालात ऐसे ही रहे, तो यह पहाड़ी राज्य नक्शे से ही गायब हो जाएगा।’ सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा-‘ विकास और पर्यावरण में संतुलन जरूरी है। हमें विकास को संतुलित करना होगा।’ इसके साथ ही सर्वोच्च अदालत ने केंद्र सरकार, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर राज्यों की सरकारों, केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु मंत्रालय, भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) को भी नोटिस जारी करके इन सभी से जवाब तलब किया।
सर्वोच्च न्यायालय की चिंता वाजिब और काबिलेगौर है। क्योंकि यह स्थिति अचानक नहीं आ गई। इसके पीछे हमारी लिप्सा और सब कुछ बहुत जल्दी पा लेने की हड़बड़ी है। पहाड़ों पर बहुत तेजी के साथ वनों की कटान करके उनका शहरीकरण हो रहा है। पहाड़, वन, नदियां, झीलें, झरने और यहां की जैवविविधता मनुष्य की अति-दखलंदाजी से पीड़ित हैं। उन पर रहम करने को कोई तैयार नहीं है। सभी के बीच पैसे बनाने और पहाड़ों के बहुमूल्य प्राकृतिक संसाधनों के अधिक से अधिक दोहन की होड़ मची है। गर्मियों में मसूरी, नैनीताल, कुल्लू-मनाली, शिमला जैसे पर्वतीय स्थलों पर पर्यटकों की इतनी अधिक भीड़ इकट्ठा हो जाती है कि सारी व्यवस्था अस्त-व्यस्त और कई बार ध्वस्त हो जाती है।
पहाड़ों पर बहुत तेजी से जल बिजली परियोजनाएं लगाई जा रही हैं। वनों की कटाई करके फोरलेन बनाए जा रहे हैं। स्थानीय लोगों ताल-तलैयों और नालों को पाटकर उस पर अवैध निर्माण कर लिया है या फिर उस पर लोग अपनी व्यावसायिक गतिविधियां चला रहे हैं। कमाना या कमाने की इच्छा रखने में कोई बुराई नहीं है लेकिन कमाने की यह इच्छा जब हवस का रूप ले ले और पारिस्थिकीय तंत्र की कीमत पर होने लगे तो इस पर विचार करना जरूरी हो जाता है। अगर पहाड़ नहीं रहेंगे तो वहां के स्थानीय लोगों को भूखों मरने की नौबत आ जाएगी। क्योंकि वहां का पर्यटन उद्योग ही खत्म हो जाएगा। जिन मेहमान पर्यटकों को लुभाने के लिए यहां बड़े-बड़े होटल और स्टेहोम बनाए जा रहे हैं, तब वे आएंगे ही नहीं।
ये सभी आपदाएं जलवायु परिवर्तन के कारण आ रही हैं। मजे की बात यह है कि जब भी ऐसी आपदा आती है तो इस पर काफी चर्चा होती है। लेकिन कुछ दिन बीतने के बाद सरकारें इन आपदाओं को रोकने के स्थायी व्यवस्था करने के बजाय दूसरे कार्यों में लग जाती हैं। इस तरफ से उनका ध्यान हट जाता है। उनका ध्यान पुनः तब इस पर आता है, जब नई आपादा आती है। ऐसे में सबसे पहले जरूरी है कि हर इलाके में चिह्नत करके नो-कंस्ट्रक्शन जोन बनाए जाएं। ईआईए (एनवायरमेंट इंपैक्ट एसेसमेंट) अध्ययन उन्हीं कंसल्टेंसी कंपनियों से करवाया जाए (यह अध्ययन-रिपोर्ट किसी भी नए और बड़े प्रोजेक्ट्स को शुरू करने के पहले जरूरी होती है), जो पहाड़ी स्थलों के पारिस्थितकीय इतिहास और उसके चाल-चरित्र को जानते हों। इसके अलावा हर प्राकृतिक आपदा के बाद इसका कारण तलाशने के लिए जो अध्ययन दल बनाया जाता है, जो मौके पर जाकर स्थितियों का अध्ययन करके अपनी रिपोर्ट्स देता है, उन रिपोर्टों को बंद फाइलों से झाड़-पोंछकर निकाला जाए और उसमें दिए गए सुझावों पर कड़ाई से अमल किया जाए।
इसके साथ वैज्ञानिकों की एक बड़ी टीम को वैज्ञानिक अध्ययन के लिए तैनात किया जाना चाहिए जो उन तरीकों पर काम करें, जिनसे प्राकृतिक आपदा आने पर जनधन की कम हानि हो। जैसे अगर हमारे वैज्ञानिक आपदाओं के प्रेडिक्शन पर काम करें तो ये आपदाएं आने के पूर्व चेतावनी जारी की जा सकेगी। इससे जानमाल का कम नुकसान होगा। इसी तरह के बहुत से अध्ययन हमारे वैज्ञानिक कर सकते हैं, जिनसे मानवमात्र और इन पहाड़ी राज्यों का भला हो सकता है।
ऐसा नहीं है कि सड़क, बिजली परियोजनाओं आदि पर काम नहीं किया जाना चाहिए। ये सभी जरूरी हैं लेकिन ये सतत विकास (सस्टनेबल डेवलपमेंट) मॉडल पर ही चलाई जानी चाहिए। इससे विकास के साथ-साथ हमारे और हमारी आने वाली पीढ़ी के अस्तित्व पर कोई संकट नहीं आएगा। आज की सच्चाई यह है कि हम पूंजीवाद को नहीं रोक सकते लेकिन उसके साथ पारस्परिक समझ तो स्थापित कर सकते हैं। ऐसा करना आज के समय की जरूरत है। अगर हम ऐसा करने में सफल हुए तो विकास भी होगा और हमारी प्रकृति भी बची रहेगी। यानि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बना रहेगा। ऐसा करना कोई बहुत मुश्किल काम नहीं है। आइए, हम अपने बचपन को याद करें जब प्रकृति के साथ हमारा रिश्ता पारस्परिक समझ से ओतप्रोत हुआ करता था। रोज ही हम किसी न किसी बहाने प्रकृति से संवाद करते थे। बस उसी रिश्ते को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है। अगर इस मुद्दे पर हमारा समाज जागरूकता और दृढ़ता के साथ आगे बढ़ेगा तो हमारी सरकारें वही करेंगी, जो हम चाहेंगे। आखिर उन्हें हम ही तो चुनते हैं। लेकिन यह काम हमें बहुत जल्दी करना होगा क्योंकि समय अब बहुत कम बचा है।
(लेखक ‘लखनऊ फोकस’ के संपादक और पब्लिक पॉलिसी व गवर्नेंस मामलों के जानकार हैं।)




