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बाजार के मोह में भक्ति को डुबोया जा रहा

Lucknow Focus News Desk: श्रीमदभागवत की एक कथा है। जब वेदव्यास जी को अज्ञान के मोह ने व्याप्त कर लिया तो उनको देवर्षि नारद ने सुझाव दिया कि आप श्रीमदभागवत की रचना करें। उससे आप का यह अज्ञान दूर होगा और आप को परम सुख मिलेगा। उसी श्रीमदभागवत की प्रसिद्ध कथा है कि एक बार पूरे भारत का भ्रमण करने के बाद भक्ति अपने दो संतानों ज्ञान और वैराग्य के साथ गुजरात पहुंची तो वे दोनों सूख कर कांटा हो गए थे। भक्ति व्याकुल थी। उसी समय नारद जी प्रकट हुए भक्ति ने पूछा कि हे देवर्षि मेरे पुत्रों की यह दशा कैसे हुई तो नारद ने कहा कि तुम्हें संपत्ति का मायामोह व्याप्त हो गया है इसलिए तुम निर्बल हो गई हो और तुम्हारे पुत्र भी ऐसे हो गए हैं। ठीक यही दशा आज के भारत में बनारस और प्रयागराज में भक्ति और उनके दोनों पुत्रों ज्ञान और वैराग्य की हो गई है। इन दोनों केंद्रों में भक्ति को धन और बाजार के वैभव ने घेर लिया है। इसीलिए कहीं बनारस में शिव की नगरी और विष्णु की साधना स्थली मणिकर्णिका घाट में हजारों साल पुराने मंदिर तोड़े जा रहे हैं और महारानी अहिल्याबाई होल्कर की प्रतिमा तोड़कर पानी में फेंकी जा रही है तो प्रयागराज के संगम तट पर आयोजित कुंभ में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद को शाही स्नान से रोककर न सिर्फ उनके शिष्यों की शिखा पकड़कर उन्हें घसीटा और पीटा जा रहा है बल्कि शंकराचार्य से उनकी कैफियत पूछी जा रही है कि किसने उन्हें शंकराचार्य नियुक्त किया।

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव से लेकर कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे तक इस कुकृत्य से आक्रोशित हैं और उन्होंने आरोप लगाया है कि प्रदेश सरकार तो सनातन धर्म का ही नाश कर रही है। बनारस के नागरिक और शिव भक्तिनी महारानी अहिल्याबाई होल्कर को अपना पूर्वज मानने वाले पाल समाज ने तो प्रदर्शन किया और लाठियां खाईं। दरअसल बनारस से प्रयागराज तक सरकारी दमन और बुलडोजर न्याय का जो कृत्य चल रहा है उसके पीछे कॉरपोरेट को लाभ पहुंचाने के साथ धर्म से राजनीति की चाकरी और ठकुरसोहाती करने का इरादा है। बाजारवाद के इसी इरादे को उपन्यासकार काशीनाथ सिंह ने कासी का अस्सी में बहुत खूबी के साथ व्यक्त किया है। किस तरह से उदारीकरण के साथ शुरू हुए सांप्रदायिक वातावरण और बाजार की मानसिकता ने बनारस में दंगे करवाए और किस तरह से कथा के नायक ने पर्यटन से धन कमाने की लालच के वशीभूत होकर अपने ही घर में स्थापित शिव को हटाकर उन्हें किसी चौराहे पर फेंक दिया।

बाजारवाद के इसी कृत्य का वर्णन मीरा नंदा ने अपनी पुस्तक द गॉड मार्केट में बखूबी किया है। धर्म अब एक बाजार है और राजनीति ने उसे सत्ता पाने का तो पूंजीपतियों ने धन कमाने का औजार बना दिया है। अगर इसी मानसिकता के तहत प्रयागराज के कुंभ में पूंजीपतियों और राजनेताओं के लिए विशेष स्नान का प्रबंध किया गया है तो उसी के तहत बनारस में पहले काशी विश्वनाथ कोरीडोर बनाने के लिए तमाम मंदिर तोड़े गए, दाल मंडी तोड़ी गई, राजघाट स्थित गांधी विद्या संस्थान तोड़ा गया और आज महाश्मशान कहे जाने वाले मणिकर्णिका घाट पर बुलडोजर चलाकर उसे फाइव स्टार वाला श्मशान बनाया जा रहा है। तर्क यह है कि यहां गंदगी रहती है और दाह के लिए आने वाले श्रद्धालुओं को आराम नहीं मिलता। वास्तव में यह बनारस को पर्यटन स्थल बनाने का उत्साह है और उसी के माध्यम से कॉरपोरेट को धन कमाने की छूट देने का उपक्रम है। परिणामस्वरूप धर्म का वह रूप छीन लेने का प्रयास है जिसके तहत भक्ति की संतानें ज्ञान और वैराग्य हैं।

धन वाले लोग संतों की वाणी और परंपरा को किस तरह से विकृत करते हैं इसका प्रमाण कबीर चौरा के महंत विवेक दास जी प्रस्तुत करते हैं। उनका कहना था कि कबीर की वाणी में जो क्रांतिकारिता थी उसे पश्चिम भारत के एक सेठ धर्मदास ने अपने व्यापार के लोभ में नष्ट कर दिया। कबीर अब वह कबीर नहीं रहे। वास्तव में कबीर के पुत्र कमाल उन्हीं के चक्कर में पड़कर गुजरात गए थे। आज प्रयागराज और बनारस की परंपराओं के साथ वही हो रहा है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के उसी चरित्र का वर्णन स्वयं हिंदू धर्म के मर्मज्ञ और गोरक्षा आंदोलन के नेता रहे स्वामी करपात्री जी ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पर लिखी अपनी पुस्तक में किया है। उनका कहना है कि संघ के लोग वास्तविक हिंदू धर्म को न जानते हैं और न समझते हैं। उनका प्रयास उसकी आड़ में भारतीय समाज को भटकाना और धार्मिक संस्थाओं पर कब्जा करना है। उनकी चुनौती है कि जिस भगवा ध्वज को वे लोग सनातन ध्वज बताते हैं वास्तव में ऐसा कोई ध्वज सनातन परंपरा में नहीं है। महाभारत में देखिए तो कृष्ण अर्जुन के जिस रथ के सारथि बने उसका ध्वज अलग था, भीष्म का ध्वज अलग था, द्रोणाचार्य का ध्वज अलग था, युद्धिष्ठिर का ध्वज अलग था।

आज बनारस और प्रयागराज में चलने वाले प्रशासनिक कारनामों पर न सिर्फ विपक्षी राजनीतिक दल उत्तेजित हैं बल्कि व्यापक हिंदू समाज नाराज है। वह सवाल कर रहा है कि धर्म, संस्कृति की जो प्राचीन विरासत है उसे पर्यटन और राजनीतिक स्वार्थ के चलते क्यों नष्ट किया जा रहा है। डॉ लोहिया ने इसे ही हिंदू बनाम हिंदू की बहस कहा है। एक ओर कट्टर हिंदू सत्ता है जो धर्म को अपने ढंग से हांकना चाहती है उसे तोड़ना चाहती है और दूसरी ओर वह उदार जनता है जो अपने पौराणिक और धार्मिक प्रतीकों और तीर्थों के साथ भक्ति भाव से जीना चाहती है। उसे अपने शंकराचार्य का सम्मान चाहिए, उसे बनारस की सफाई भी चाहिए और प्राचीन विरासत भी चाहिए। संकट मोचन मंदिर के महंत विश्वंभर नाथ मिश्र ठीक ही कहते हैं कि काशी भगवान शिव के आदेश से चलती है। उस पर कोई राजसत्ता अपना आदेश थोपने की कोशिश न करे। जाहिर सी बात है कि अब भाजपा के 12-13 साल के शासन के बाद उसके विरुद्ध हिंदू समाज का विद्रोह शुरू हो चुका है। पीडीए समाज भी इसमें पीछे नहीं है। वह अपनी पूर्वज रानी अहिल्याबाई होल्कर का अपमान नहीं सहेगा। बाकी हिंदू समाज भी खरी खरी बोलने वाले अविमुक्तेश्वरानंद के साथ ऐसा व्यवहार बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है। हिंदू समाज के भीतर यह द्वंद्व शुभ है इसका कोई न कोई बेहतर परिणाम निकलेगा।

(लेखक समाजवादी पार्टी के राज्य सचिव और उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व सदस्य हैं। आलेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं। )

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