एफसीएम के डोज से होगा एनीमिया प्रबंधन, मातृ एनीमिया प्रबंधन के लिए प्रदेश सरकार की अनूठी पहल

Lucknow Focus News Desk: यूपी को एनीमिया मुक्त बनाने की दिशा में बड़ी पहल होने जा रही है। किसी भी गर्भवती या स्तनपान कराने वाली महिला में खून की कमी होने पर उसे फेरिक कार्बोक्सी माल्टोस (एफसीएम) इंजेक्शन की एक डोज लगेगी और इससे उसका हीमोग्लोबिन स्तर बढ़ जाएगा। ये इंजेक्शन सभी फर्स्ट रेफरल यूनिट (एफआरयू) पर उपलब्ध रहेंगे।
सात चिन्हित जिलों के एफआरयू चिकित्सक व नर्स को दिया जाएगा प्रशिक्षण
प्रदेश सरकार ने इस संबंध में सात चिन्हित जिलों के एफआरयू पर तैनात सभी डाक्टरों व नर्स को प्रशिक्षित करने का फैसला किया है। महानिदेशक परिवार कल्याण के पत्र के अनुसार उत्तर प्रदेश तकनीकी सहयोग इकाई (यूपीटीएसयू) द्वारा मैटरनल एनीमिया मैनेजमेंट इनिशिएटिव (स्क्रीन, रेफर, ट्रैक, ट्रीट) परियोजना के तहत रायबरेली, सीतापुर, हरदोई, फतेहपुर, जालौन, श्रावस्ती व बहराइच में यह प्रशिक्षण आयोजित किया जाना है जिसमें किंग जार्ज मेडिकल विश्वविद्यालय (केजीएमयू) व गणेश शंकर विद्यार्थी मेडिकल कालेज, कानपुर तकनीकि पार्टनर होंगे। पहले जिले के रूप में सोमवार को रायबरेली से प्रशिक्षण की शुरुआत हुई।
केजीएमयू की स्त्री रोग विभागाध्यक्ष डॉ अंजू अग्रवाल ने बताया कि अभी तक आयरन सुकरोज इंजेक्शन किसी एनीमिया ग्रसित महिला को पांच बार देना पड़ता है। ज्यादातर महिलाएं पांच बार अस्पताल नहीं आती थीं जिससे एनीमिया उनमें बना रहता था। ‘फेरिक कार्बोक्सी माल्टोस’ इंजेक्शन की सिर्फ एक डोज लगाई जाएगी और एक हफ्ते में अंतर दिखने लगेगा।
केजीएमयू व जीएसवीएम कालेज के विशेषज्ञ देंगे तकनीकि पहलुओं पर प्रशिक्षण
डॉ अंजू ने बताया कि गर्भवती महिलाओं में एनीमिया का सबसे सामान्य कारण आयरन एवं आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी होती है। आयरन की गोलियां लेने से कब्ज, उल्टी या असहजता होने के कारण कई महिलाएं आयरन फोलिक एसिड का सेवन छोड़ देती हैं, जिससे एनीमिया बढ़ जाता है। ऐसी स्थिति में एफसीएम इंजेक्शन एक सुरक्षित एवं प्रभावी विकल्प है। इस विषय पर किए गए शोधों में इसके सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं, जिसके आधार पर सरकार ने इसे लागू करने का निर्णय लिया है और पायलट के तौर पर सात जिलों में शुरू हो रहा है।
यूपीटीएसयू की उपनिदेशक डॉ सीमा टंडन ने बताया कि एनिमिया ग्रसित महिलाओं को पांच बार अस्पताल बुलाना सुनिश्चित करना सबसे बड़ी चुनौती है। ज्यादातर महिलाएं पांच बार अस्पताल नहीं आती हैं। इससे उनके हीमोग्लोबिन स्तर को बढ़ाना मुश्किल होता था। अब एक बार ही इंजेक्शन लगने से निश्चित तौर पर बेहतर परिणाम दिखेंगे। इसके अलावा ‘फेरिक कार्बोक्सी माल्टोस’ के साइड इफेक्ट भी कम हैं।
महानिदेशक प्रशिक्षण डॉ रंजना खरे ने बताया कि इस पहल के पीछे उद्देश्य यह है कि गर्भवती सबसे पहले एफआरयू पर पहुंचती है। अगर वहीं पर उसे प्रशिक्षित डाक्टर व स्टाफ से परामर्श व इलाज मिलेगा तो निश्चित तौर पर मातृ एवं नवजात स्वास्थ्य परिणामों में अपेक्षित सुधार देखने को मिलेगा। यह पहल मातृ स्वास्थ्य को सुदृढ़ करने के साथ-साथ मातृ मृत्यु दर में कमी लाने में भी महत्वपूर्ण योगदान देगी।
सोमवार को रायबरेली में हुए पहले प्रशिक्षण कार्यक्रम में डॉ अंजू अग्रवाल व डॉ. सीमा टंडन ने एफआरयू के डाक्टरों व नर्सों को प्रशिक्षित किया। प्रशिक्षण में एफसीएम की पहचान, वर्गीकरण, उपचार प्रोटोकॉल, सुरक्षित उपयोग, दुष्प्रभाव प्रबंधन तथा केस आधारित चर्चाओं पर विस्तृत जानकारी दी गई।




