मूल रचना की आत्मा से खिलवाड़ न करें रूपांतरकार: लखनऊ पुस्तक मेला में ‘मंजुश्री’ द्वारा गंभीर विमर्श आयोजित

Lucknow Focus News Desk: साहित्यिक रचनाओं के नाट्य या फिल्मी रूपांतरण (Adaptation) के दौरान एक रचनाकार की मूल भावना को सुरक्षित रखना कितना अनिवार्य है? इस ज्वलंत विषय पर नगर की प्रतिष्ठित संस्था ‘मंजुश्री लखनऊ’ द्वारा रवींद्रालय परिसर में आयोजित लखनऊ पुस्तक मेला के मंच पर एक विचार गोष्ठी संपन्न हुई।
गोष्ठी का मुख्य विषय
“मूल रचना के साथ रूपांतरकार की स्वतंत्रता: सीमाएं और चुनौतियां” विषय पर आयोजित इस चर्चा में शहर के दिग्गज साहित्यकारों और रंगकर्मियों ने हिस्सा लिया और रूपांतरण के नाम पर मूल कृतियों के साथ होने वाली ‘छेड़छाड़’ पर सवालिया निशान लगाया।
प्रमुख वक्ताओं के विचार
दयानंद पांडेय (वरिष्ट साहित्यकार): उन्होंने कहा कि समय की मांग और माध्यम (जैसे फिल्म या नाटक) की जरूरत के अनुसार निर्देशक को कुछ स्वतंत्रता मिलना जायज है, लेकिन यह स्वतंत्रता मर्यादित होनी चाहिए। उन्होंने पुरानी और नई फिल्मों के उदाहरणों से अपनी बात पुष्ट की।
अमिता दूबे (मुख्य संपादक, उ.प्र. हिंदी संस्थान): उन्होंने एक अत्यंत मार्मिक बात कही “मूल रचना एक रचनाकार की आत्मा होती है, हम उसकी आत्मा को कैसे मार सकते हैं?” उन्होंने स्पष्ट किया कि कागज पर रची गई कल्पना और मंच की सजीवता में भेद होता है, जो माध्यम की उपलब्धता पर निर्भर करता है।
संगम बहुगुणा (वरिष्ठ नाट्य निर्देशक): गिनीज बुक रिकॉर्ड होल्डर निर्देशक ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि मूल कृति का रूपांतरण यथासंभव वर्जित होना चाहिए ताकि कहानी की मूल सुगंध बनी रहे। यदि अनिवार्य हो, तो उसकी मूल भावना से कोई छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए।
शैलेश श्रीवास्तव (अध्यक्ष, मंजुश्री): उन्होंने चर्चा का सार रखते हुए कहा कि अक्सर जब रूपांतरकार, अभिनेता और निर्देशक एक ही व्यक्ति होता है, तो वह ईमानदारी नहीं बरत पाता। रूपांतरण ‘आधारित’ हो तो थोड़ी छूट मिल सकती है, ‘मूल’ के साथ नहीं।
कार्यक्रम की रूपरेखा
- आयोजक: नाट्य एवं साहित्यिक संस्था ‘मंजुश्री लखनऊ’।
- सम्मान: उपाध्यक्ष विवेक शुक्ला ने वक्ताओं को अंगवस्त्र और स्मृति चिह्न भेंट कर सम्मानित किया।
- जिज्ञासा समाधान: वार्ताकार अजय मिश्र ‘अजयश्री’ ने बेबाकी से प्रश्न पूछकर दर्शकों की जिज्ञासाओं का समाधान किया।
- संचालन: कार्यक्रम का सफल संचालन प्रिया पुरवार द्वारा किया गया।
- इस विमर्श में करुणा शंकर उपाध्याय, संजय श्रीवास्तव, ज्योति किरन रतन और अदिति तिवारी जैसे कई रंगकर्मियों और साहित्यकारों ने भी सक्रिय भागीदारी की।
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