उत्तर प्रदेश

मेडिकल व नर्सिंग कॉलेजों में संविदा प्रथा पर हाईकोर्ट सख्त, ‘बिना ढांचे अनिश्चितकाल के लिए संविदा पर रखना शोषण और असमानता’

Lucknow Focus News Desk: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के सरकारी मेडिकल और नर्सिंग कॉलेजों में वर्षों से नियमित नियुक्तियों के बजाय संविदा (कॉन्ट्रैक्ट) व्यवस्था पर संस्थान चलाने को बेहद गंभीर माना है। न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि बिना किसी वैधानिक ढांचे के कर्मचारियों को अनिश्चितकाल तक संविदा पर रखना उनके शोषण की आशंका को बढ़ाता है और यह संविधान के समानता के मौलिक अधिकार का सीधा उल्लंघन है।

बदायूं निवासी याची श्रीनिवासन (प्रिंसिपल-सह-प्रोफेसर) की संविदा सेवा रद्द किए जाने से जुड़ी याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने पाया कि राज्य के नर्सिंग व मेडिकल कॉलेजों में 500 से अधिक पद संविदा पर चल रहे हैं, जबकि महज 2 से 3 प्रतिशत पद ही नियमित हैं। इसके अलावा 25 प्रतिशत मेडिकल व नर्सिंग कॉलेज कार्यवाहक प्राचार्यों के भरोसे संचालित हो रहे हैं।

कोर्ट का अंतरिम परमादेश व निर्देश

नियमावली को तुरंत मंजूरी: हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को अंतरिम आदेश जारी कर कहा है कि वह नियमित भर्तियों के लिए प्रस्तावित ‘उत्तर प्रदेश नर्सिंग कॉलेज, शिक्षक, सेवा नियमावली, 2026’ के ड्राफ्ट को तत्काल मंजूरी देकर अधिसूचित करे, ताकि पारदर्शी व नियमित भर्ती प्रक्रिया शुरू हो सके।

रिक्तियों का ब्योरा तलब: मामले की अगली सुनवाई 13 अक्टूबर 2026 तय करते हुए कोर्ट ने चिकित्सा शिक्षा विभाग के महानिदेशक को हलफनामा दाखिल कर राज्य के सभी मेडिकल कॉलेजों में खाली पड़े प्रोफेसर पदों, कार्यवाहक विभागाध्यक्षों और भर्ती विज्ञापनों की वर्तमान स्थिति का विस्तृत ब्योरा पेश करने का निर्देश दिया है।

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