उपन्यास: दुनिया के लगातार हिंसक होने का जीवंत वर्णन

लेखक- चंद्रकिशोर जायसवाल
साहित्य मनुष्य की इतिहास से मुक्ति का आख्यान है। वह मनुष्य के अचेतन में उसी तरह सीधा संवाद करता है, जैसे सचेतन रूप में उपलब्ध किए गए अनुभवों के साथ। वह मनुष्य के भीतर छिपे उसके जैव इतिहास से भी वैसा ही रिश्ता बनाता है, जैसा समाज सांस्कृतिक ज्ञानेतिहासों के साथ।
आधुनिक काल का अधिकांश उपन्यास उस सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक यथार्थ का चित्रण करते हैं जो मनुष्य को चारों तरफ से घेरे हुए है। यह इतिहास गहरे में मनुष्य की पीड़ाओं का स्रोत बनकर उभरता है और मनुष्य के मुक्त होने का मार्ग में लगातार रुकावट बनता है। आधुनिक काल की अन्य सभी विधाओं के मुकाबले उपन्यास मनुष्य की इस बिडम्बनापूर्ण स्थिति को बड़ी व्यापकता और गहराई से पकड़ता और अभिव्यक्त करता है।
‘दुखग्राम’ वरिष्ठ कथाकार चंद्रकिशोर जायसवाल का उपन्यास है। मानसिक विकलांग (मंदबुद्धि) बच्चे के जीवन को केंद्र में रखकर कहानी रची गई है। वैसे तो कहानी के कई किरदार हैं, लेकिन अगर बच्चे को छोड़ दें तो मुख्य रूप से दो पात्र हैं जिनके बातचीत के रूप में इस उपन्यास का सृजन किया गया है। पूर्णिया के एक कॉलेज में अर्थशास्त्र विषय के विभागाध्यक्ष अमरनाथ भगत, जो उपन्यास के तीन चौथाई से अधिक हिस्से तक ‘श्रीमान जी’ और ‘सर’ के रूप में चित्रित किए गए हैं, दूसरे हैं उनके विभाग में नियुक्त होकर आए सहायक प्रोफेसर श्रीकांत। संयोग से श्रीकांत कहानीकार भी हैं। श्रीमान जी को श्रीकांत के रूप में एक ऐसा व्यक्ति मिल जाता है जिससे वह अपनी बात कह सकते हैं। मन की बात भी क्या, उनकी बातचीत का केंद्र उनका सात साल का पोता मयंक होता है। जिसके जीवन को लेकर वह बेचैन हैं। उनकी व्यथा का कारण बच्चे के ठीक न हो पाने की कोई संभावना न होना है। बल्कि मयंक के मंदबुद्धि होने का संताप भगत जी सबसे अधिक ढो रहे हैं। वैसे कहा भी गया है कि मूल से सूद ज्यादा प्रिय होता है अर्थात बेटे से ज्यादा प्रिय पौत्र होता है। चंद्रकिशोर जायसवाल का यह उपन्यास दादा-पोता की कहानी के बहाने दुनियाभर में बच्चों के लिए खराब होते हालात पर सोचने के लिए मजबूर करता है।
कहानीकार ने कहानी का गुंफन इतने तरीके से किया है कि अमरनाथ भगत जी को किसी पर विश्वास नहीं है। संभवतः इसके पीछे समाज का चरित्र है। मयंक को लेकर दादा इतने पोजिसिव हैं कि वह कल्पना कर लेते हैं कि बच्चे की नानी किसी न किसी बहाने नाती को मार डालेगी। वे यह मान लेते हैं कि चूंकि बच्चा मानसिक विकलांग है, उसका पालन पोषण करना बहुत कठिन होगा। बच्चा जीवनभर दूसरों की सहायता पर आश्रित होगा इसलिए उसकी नानी अपनी बेटी का जीवन सुखमय बनाने के उद्देश्य से नाती को किसी न किसी बहाने मार डालेगी।
उपन्यास का नाम रखा है-दुखग्राम। दुखग्राम की परिभाषा भी मुख्य किरदार अमरनाथ भगत के जरिये कहानीकार देता है- ‘दुनिया में सुख भले ही सुलभ न हो, दुख खोजने कहीं जाना नहीं पड़ता।‘ पोते के मंदबुद्धि होने के कारण प्रोफेसर साहब बहुत डरे हुए हैं और सबसे अधिक दुखी भी हैं। वह पोते का जीवन हर तरह से निष्कंटक बना देना चाहते हैं, लेकिन समाज में रोजाना कोई न कोई ऐसी घटना होती रहती है जो उनकी चिंता को बढ़ा देती है। इस संत्रास को प्रदर्शित करने के लिए कहानीकार ने उपन्यास में जगह जगह घटनाओं के ऐसे उदाहरण दिए हैं जिनमें बच्चे सुरक्षित नहीं हैं। श्रीकांत से जब वह मयंक के जीवन को लेकर उसकी नानी के षड्यंत्रों की कल्पना कर रहे थे तो अपने अंदेशे के पक्ष में तर्क भी दे रहे थे। पहले वह पुराने समय में दुनिया में बच्चों के प्रति कैसा रवैया रहा है इसका वर्णन करते हुए उदाहरण पेश करते हैं- यूनान में मां नवजात को लेकर पति के पास जाती थी और पति से पूछती थी कि वह इसे स्वीकार करता है या नहीं। पति ने स्वीकार नहीं किया तो उस बच्चे को मरना था।- बेबीलोन में हर दसवें बच्चे की बलि दी जाती थी। -सीरिया में पहला बच्चा सुरक्षित नहीं था. वहां के देवता जुपिटर और जूनो को परिवार के पहले बच्चे का खून चाहिए। -रोम में मां दिनदहाड़े नवजात को टीवर नदी में फेंक रहीं थीं। इन उदाहरणों को देने के बाद वह अपना डर भी जताते हैं- मुझे क्यों लगने लगा है कि उन बच्चों में मेरा मयंक भी है।
एक दिन भगत जी अखबार लेकर श्रीकांत के पास आते हैं। उसमें एक बच्चे की फोटो छपी हुई जो इतनी विकृत हो चुकी है कि पहचान पाना मुमकिन नहीं है। पता चलता है कि सीरिया के बच्चे की फोटो है जो गृहयुद्ध का शिकार हुआ होता है। यह फोटो दुनियाभर के कई अखबारों में प्रकाशित हुई थी जिसे देखकर हर व्यक्ति का मन व्यथित हो गया था। उपन्यास में उस फोटो के वर्णन के जरिये लेखक ने युद्ध और हिंसा की वैश्विक बीमारी की आलोचना की है।
लेखक ने उपन्यास में कई सवाल भी खड़े किए हैं। वह घटनाओं का चित्रण करके टिप्पणी करता है। वह निराश तो हैं पर आशावाद उनका संबल है। उपन्यास में जहां दुनिया के लगातार हिंसक होने, समाज की क्रूरता और कपट का वर्णन है, वहीं बेहतर भविष्य की उम्मीद भी की गई है। लेखक मानता है कि यह तभी संभव है, जब संवेदनशील साहित्य रचा जाए।
समीक्षक-आलोक वर्मा




