कराहती गोमती

गोमती का पानी प्रदूषण के मामले में अव्वल बन चुका है। राजधानी की यह जीवनदायिनी, जिसकी कोख से रोजाना लाखों गैलन पीने का पानी खींचकर राजधानीवासियों की प्यास बुझाई जाती है, अब मरणासन्न है। इसके साथ ही मरणासन्न हैं इसके भीतर रहने वाले जलीय जंतु और वनस्पतियां, जो हमारे पारिस्थितिकीय तंत्र को संतुलित करने का काम करती हैं। आप एक सिरे से गोमती के निरीक्षण को निकल जाइए तो इसकी दुर्दशा देखकर आपकी आंखों में आंसू आ जाएंगे। आप पाएंगे कि गोमती मां का स्वास्थ्य बुरी तरह बिगड़ चुका है। यह बदहाल स्थिति तब है जब इसकी सफाई पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा चुके हैं। ऐसे में पिछले दिनों लक्ष्मण झूला घाट पर आयोजित छठ मेले में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की इस घोषणा से कि डेढ़ साल में गोमती को प्रदूषणमुक्त कर लिया जाएगा, लोगों में एक बार फिर आशा की उम्मीद जगी है। अगर मुख्यमंत्री के ये प्रयास फलीभूत नहीं हुए तो आने वाले दिनों में लखनऊ की स्थिति दिल्ली से भी अधिक नारकीय हो जाएगी। बता रहे हैं….सौरभ कुमार तिवारी … इस रिपोर्ट में।
पिछले दिनों छठ के दौरान लखनऊ के लक्ष्मण मेला घाट पर आयोजित एक कार्यक्रम में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि डेढ़ साल के भीतर पीलीभीत से गाजीपुर तक गोमती नदी के पानी को स्वच्छ किया जाएगा। इसमें गिरने वाले सभी गंदे नालों और सीवेज को रोका जाएगा। मुख्यमंत्री ने कहा कि डेढ़ साल बाद गोमती में एक बूंद सीवेज नहीं गिरेगा, उसके लिए सरकार तेजी से काम कर रही है। इसके पहले गोमती टास्क फोर्स की बैठकों और दूसरे आयोजनों में भी मुख्यमंत्री गोमती स्वच्छता के प्रति अपनी कड़ी प्रतिबद्धता दोहरा चुके हैं।
दरअसल, गोमती स्वच्छ बने, यह मुख्यमंत्री की मुख्य प्राथमिकताओं में है। उसके लिए बहुत से काम हुए हैं पर सरकारी तंत्र का कमाल कहें कि यह उद्देश्य प्राप्त करना अभी तक आकाश-कुसुम ही लग रहा है। पौराणिक धेनुमति की राजधानी में स्थिति यह है कि बहुत स्थानों पर इसके पानी से बदबू आती है और इसमें घुलित ऑक्सीजन की मात्रा इतनी ज्यादा कम हो गई है कि अगर यह कहा जाए कि गोमती घुट-घुटकर मर रही है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की छठ पर्व पर गोमती को लेकर की गई घोषणा से आम जनमानस में एक बार फिर उम्मीद बंधी है।
बड़ा प्रश्न यह है कि यह स्थिति क्यों और कैसे आई ? इसके लिए कौन दोषी है और गोमती के स्वास्थ्य में सुधार कैसे होगा ? उस गोमती में सुधार, जिसके स्वास्थ्य से राजधानी और राजधानीवासियों का स्वास्थ्य अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है।

ऐसा नहीं है कि गोमती की स्वच्छता के लिए काम नहीं हुए हैं। काफी काम हुए हैं पर ये नाकाफी थे या आधे-अधूरे मन से किए गए थे। यही कारण है कि उत्तर प्रदेश के पीलीभीत के माधोटांडा से शुरू होकर गाजीपुर में गंगा में मिल जाने वाली पौराणिक नदी गोमती में गंदगी की स्थिति यह है कि यह जलकुंभियों से अटी पड़ी है। इसका पानी नहाने और आचमन करने लायक नहीं रह गया है। इसके पानी में गुलित ऑक्सीजन का स्तर इतना नीचे गिर गया है कि ये मृतप्राय है। तिल-तिल करके मर रही है। यह स्थिति तब है जब प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का इस बार पर खास जोर है कि गोमती का पानी शुद्ध हो। इसके लिए उनकी राज्य सरकार ने गोमती नदी पुनर्जीवन मिशन शुरू किया है। उस पर पर्याप्त धन भी खर्च किया है। फिर भी गोमती की जो मौजूदा स्थिति है, वह अच्छी नहीं कही जा सकती।
कहा जा सकता है कि लखनऊ की जीवनरेखा कही जाने वाली गोमती का प्रदूषण तमाम सरकारी प्रयासों के बावजूद एक गंभीर और अनसुलझी समस्या बना हुआ है। नदी की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है, जिसका सीधा असर इसके पारिस्थितिक संतुलन और शहर के निवासियों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। इस नदी, जो लखनऊ शहर के बीचोंबीच से बहती है, का सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व भी है। इस नदी का वर्णन रामायण में है। पर दुखद यह है कि दशकों से अनियंत्रित शहरीकरण, औद्योगिक कचरे के गिरने और सीवेज के पानी ने इसे एक खुली नाली में तब्दील कर दिया है। गोमती के पानी में मैलापन और दुर्गंध स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। इसके भीतर फेंके गए ठोस कचरे और प्लास्टिक के बड़े-बड़े ढेर कई जगहों पर जलबहाव को अवरुद्ध करते हैं।

किसी भी नदी के पानी में प्रदूषण का सबसे खतरनाक पहलू पानी में घुलित ऑक्सीजन की मात्रा में भारी कमी आना होता है। गोमती में ऑक्सीजन का स्तर इतना नीचे गिर गया है कि जलीय जीवन के लिए खतरा पैदा हो गया है, जिससे मछलियों की मौत की खबरें अक्सर आती रहती हैं। ये खबरें जब अखबारों में छपती हैं तो एकबारगी आह करके हम सभी गोमती की दुर्गति पर चिंता जताकर फिर से इधर से आंखें मूंद लेते हैं। यह स्थिति तब है, जब गोमती एक्शन प्लान पर ढेर सारा पैसा खर्च किया जा चुका है। स्थिति पहले ही जैसी है। देखने में ऐसा लगता है गोमती का कोई खेवनहार नहीं है। इसके अलावा गोमती के किनारों पर लखनऊ और इससे संबंधित अन्य जिलों में इतना अतिक्रमण है कि उससे भी गोमती का दम घुट रहा है। वैज्ञानिकों को कहना है कि अपना प्रदूषण नदी काफी हद तक खुद साफ कर लेती है लेकिन इसके लिए उसके किनारों पर अतिक्रमण नहीं होना चाहिए। यहां हो उल्टा रहा है। गोमती के तटों के जमीनों पर कई अतिक्रमण हैं। दरअसल, हम अपनी पुरानी संस्कृति से कट गए हैं, जिसमें नदियों और तालाबों पर कब्जा करने को पाप माना गया था। उसके किनारों की पूजा की जाती थी। इसके लिए प्रशासन को सख्त होना होगा और नदी-तालाबों के किनारों के अतिक्रमण को रोकना होगा (देखें इनसेट)।

गोमती के प्रदूषण के कारण यहां के एसटीपी भी हैं। राजधानी में जो सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) लगे हैं, वे पूरी क्षमता से नहीं चलाए जा रहे हैं। इसके अतिरिक्त जितने सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स होने चाहिए, उतने हैं भी नहीं। ऐसी स्थिति में तमाम अनुपचारित सीवेज सीधे गोमती में गिरता है। कोढ़ में खाज यह है कि कई स्थानीय कारखानों का जहरीला पानी और कचरा भी सीधे इसमें गिर रहा है। इस गंदगी को और अधिक परवान चढ़ाने का काम कर रहे हैं कुछ नाले, जो सीधे गोमती में गिर रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में धार्मिक अवसरों पर घरों, मुहल्लों में मूर्तियां रखने और उनके विसर्जन का रिवाज पहले से कई गुना बढ़ा है। हालांकि प्रशासन इन मूर्तियों के विसर्जन के लिए वैकल्पिक स्थान उपलब्ध करवाता है लेकिन वे अपर्याप्त होते हैं। कुल मिलाकर धार्मिक अनुष्ठानों में उपयोग होने वाली पूजन सामग्रियों से भी गोमती का प्रदूषण बढ़ रहा है। दीवाली पर पिछले साल की पुरानी हो चुकीं गणेश-लक्ष्मी की मूर्तियों को चुपके से रात में गोमती में फेंक आने की प्रवृत्ति पर भी अंकुश नहीं लग पा रहा है।
एक अध्ययन के अनुसार गोमती के पानी में घुलित आक्सीजन (डीओ) की मात्रा बेहद कम है, जो जलीय जीवन के अस्तित्व और पानी की अच्छी गुणवत्ता के लिए आवश्यक है। यह डीओ (डिजाल्व्ड ऑक्सीजन या घुलित ऑक्सीजन) वायुमंडल से अवशोषण और नदी में उपस्थित जलीय पौधों द्वारा प्रकाश संश्लेषण की क्रिया करने से पानी में आता है। गोमती में बढ़े प्रदूषण के चलते जलीय पौधों का अपना जीवन ही सुरक्षित नहीं है तो वे बेचारे प्रकाश संश्लेषण (अपना भोजन बनाने की क्रिया) क्या करेंगे?

पीलीभीत के माधोटांडा से निकलकर गाजीपुर में जाकर गंगा में मिल जाने वाली गोमती नदी के पानी की गुणवत्ता इसके राजधानी लखनऊ की सीमा में प्रवेश करते ही खराब होनी शुरू हो जाती है। शहर के 25-30 किलोमीटर के दायरे में यह प्रदूषण चरम पर है, इससे यह स्वयंसिद्ध है कि गोमती को प्रदूषित करने वाले सबसे ज्यादा कारक-तत्व लखनऊ में ही हैं।
एक स्वस्थ नदी जल में डीओ का स्तर 6.5 से 8.0 ग्राम प्रति लीटर होना चाहिए। पानी के जलीय जीवों के लिए यह डीओ स्तर 5.0 ग्राम प्रति लीटर से कम नहीं होना चाहिए। जबकि एक रिपोर्ट के अनुसार लखनऊ में शहीद पथ और कुड़िया घाट के पास डीओ (पानी में घुलित ऑक्सीजन) का स्तर गिरकर 1.5 मिलीग्राम प्रति लीटर या इससे भी कम हो गया है। यह स्थिति जलीय जीवन के लिए बेहद घातक होती है और ‘हाइपोक्सिया’ (ऑक्सीजन की कमी) को दर्शाती है, जिससे मछलियाँ और अन्य जलीय जीव बड़ी संख्या में मर जाते हैं। दूसरी तरफ, बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) और केमिकल ऑक्सीजन डिमांड (सीओडी) दोनों का ही स्तर गोमती में बहुत ज्यादा है जो बड़ी मात्रा में कार्बनिक प्रदूषण का संकेत देता है। गोमती में बीओडी का स्तर 18 मिलीग्राम प्रति लीटर (ये अधिकतम मात्रा है) तक मिला है, जो सामान्य मानक (यह मानक केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मानकों के अनुसार 3 है) से बहुत अधिक है। अध्ययनों में यह भी सामने आया है कि गोमती नदी के पानी में लेड, कैडमियम और क्रोमियम जैसी भारी और घातक धातुओं के साथ फेकल कॉलीफॉर्म बैक्टीरिया के खतरनाक स्तर पाए गए हैं, जो नॉनट्रीटेड सीवेज के नदी में गिरने का परिणाम है।

उत्तर प्रदेश जल निगम (शहरी और ग्रामीण) द्वारा लखनऊ में नई एसटीपी परियोजनाओं पर काम चल रहा है। इस काम में तेजी लाया जाना बेहद जरूरी है, क्योंकि मौजूदा समय में जितने एसटीपी चालू हैं, वे पर्याप्त नहीं हैं। कुछ नए एसटीपी बन रहे हैं जबकि कुछ के लिए अभी जमीन की तलाश ही चल रही है। इन्हें जितनी जल्दी बनाकर पूरी क्षमता से शुरू किया जाएगा, उतनी जल्दी गोमती को राहत मिलेगी। इससे यह सुनिश्चित हो सकेगा कि कोई भी अनुपचारित सीवेज गोमती में न बहे।
लखनऊ शहर के भीतर गोमती नदी में कई नाले बिना ट्रीटमेंट किया हुआ पानी छोड़ते हैं। विभिन्न रिपोर्टों और सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इन नालों की संख्या और स्थिति थोड़ी भिन्न हो सकती है, लेकिन एक बात निश्चित है कि एक बड़ी मात्रा में अनुपचारित सीवेज अभी भी नदी में गिर रहा है। लखनऊ के शहरी क्षेत्र में लगभग 33 से 45 प्रमुख नाले हैं जो नदी में बहते हैं। कुछ नालों को टैप करने का दावा किया जा रहा है लेकिन उन दावों में कोई दम नहीं है।

यक्षप्रश्न है कि गोमती का पानी शुद्ध कैसे होगा ? इसके लिए एनजीटी (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल) की 2019 में की गई एक टिप्पणी से पता चलता है कि गोमती के पानी में घुलित आक्सीजन की मात्रा बहुत कम हो गई है। इससे गोमती का जलीय जीवन खतरे में है। इसे लेकर एनजीटी ने राज्य सरकार को जमकर फटकार भी लगाई थी, जो अब छह साल पुरानी बात हो गई। गोमती की इस बदहाल स्थिति पर जनवरी 2019 में एनजीटी (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल) ने बड़ी सख्त टिप्पणी की थी। इसके साथ ही साथ उसने राज्य सरकार पर जुर्माना भी लगाया था। उसने तो कड़ी टिप्पणी की थी। उसने कहा कि गोमती के किनारे सुबह की सैर करने के लिए नागरिक न जाएं। यह उनके स्वास्थ्य के लिए घातक है। एनजीटी ने कहा कि सच्चाई यह है कि गोमती की सफाई और रखरखाव में संबंधित विभागों की तरफ से जरूरी गंभीर कदम नहीं उठाए गए हैं। उसने उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को एलडीए, जल निगम, नगर निगम और वन विभाग के साथ बैठक कर गोमती की सफाई के लिए एक कार्ययोजना बनाने का निर्देश दिया था। एनजीटी की अनुश्रवण समिति ने राज्य सरकार से गोमती की सफाई और आदेशों के अनुपालन की गारंटी के लिए 100 करोड़ रुपये की गारंटी राशि भी जमा कराने का आदेश दिया था। एनजीटी ने नगर निगम लखनऊ पर दो करोड़ रुपये का पर्यावरणीय जुर्माना भी लगाया था। एनजीटी के इस फैसले के आने के बाद संबंधित विभागों में कुछ दिनों तक कुछ हलचल दिखी फिर सब कुछ पहले जैसा हो गया।
गोमती को शुद्ध करने के उपाय एनजीटी के फैसले और उसकी सीखों में ही निहित हैं। सरकार को लखनऊ में पर्याप्त संख्या में एसटीपी लगाने होंगे। जो एसटीपी आधे-अधूरे ढंग से या महज खानापूरी के लिए चल रहे हैं, उन्हें सही करना होगा। हमारे सीवेज ट्रीटमेंट का जो ढांचा है, उस पर नए सिरे से विचार करना होगा। इसके लिए एक सर्वव्यापक रणीति बनानी होगी और इसमें आम लोगों का पूरा सहयोग लेना होगा। नदी संरक्षण के उपायों को जमीनी स्तर पर अपनाना होगा। आम लोगों को इस बारे में जागरूक करने के लिए बड़े स्तर पर अभियान चलाना होगा। क्योंकि अगर गोमती का प्रदूषण नहीं रुका तो यही प्रदूषण आने वाले भविष्य में इस ऐतिहासिक शहर और यहां के निवासियों को नष्ट कर देगा। यह शहर सांस लेने लायक नहीं रह जाएगा। जैसे आज गोमती का दम घुट रहा है, वैसे लखनऊ शहर का दम घुटेगा। अगर हमारी गोमती बची रहेगी, तभी राजधानीवासी भी जीवित रहेंगे, यह बात हमें खुद गंभीरता से समझनी और दूसरों को उसी गंभीरता से समझानी होगी।

दोषी लेखपालों, तहसीलदारों, उपजिलाधिकारियों पर जब तक कड़ी कार्रवाई नहीं होगी, कुछ नहीं होगा
इस संबंध में डॉ. भीमराव अंबेडकर सेंट्रल यूनिवर्सिटी, लखनऊ के स्कूल ऑफ अर्थ एंड इनवायरमेंटल साइंसेज के प्रो. वेंकटेश दत्ता कहते हैं कि गोमती की स्वच्छता को लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का विजन एकदम क्लियर है। अभी उन्होंने वन डिस्ट्रिक्ट, वन रिवर के ऊपर भी काम शुरू करवाया है। इस योजना को हम लोग तेजी से आगे बढ़ा रहे हैं। लेकिन नदियों की जमीन प्राइवेट लोगों के नाम दर्ज हो जाना नदी संरक्षण में एक बड़ा बाधक तत्व है। वह कहते हैं कि इस समय गोमती को स्वच्छ बनाने के काम में दो सबसे बड़ी चुनौतियां हैं-अतिक्रमण और प्रदूषण। यह दुखद है कि हम नदियों के किनारों पर अतिक्रमण कर रहे हैं। अगर नदियों के किनारों का संरक्षण ठीक से हो तो नदी अपने को काफी कुछ स्वयं स्वच्छ कर लेती है लेकिन हमने नदियों के पाटों पर कब्जा कर लिया है। गोमती के 55 किलोमीटर के क्षेत्र में अतिक्रमण है। गोमती की जमीनें जमीन प्राइवेट लोगों के नाम दर्ज कर दी गई है। इसके लिए राजस्व विभाग के कर्मियों और अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए।
प्रो. दत्ता, जो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की गोमती टास्क फोर्स के सदस्य भी हैं, आगे कहते हैं कि गोमती के किनारे अतिक्रमण को रोकने के प्रति कहीं भी संजीदगी नहीं दिख रही है। कोर्ट कहता रहे कि नदी किनारों के सभी राजस्व अभिलेख फसली वर्ष 1359 के अनुसार तर्कसंगत हों पर इस निर्देश का किसी के ऊपर कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। इस मामले में राजस्व विभाग का लेखपाल जो चाहता है, वही होता है। इन दोषी लेखपालों, तहसीलदारों, उपजिलाधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई क्यों नहीं होती? जब तक इनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई नहीं होगी, कुछ नहीं होगा।
प्रो. दत्ता अपनी बात को एक उदाहरण देकर बताते हैं। वह कहते हैं कि कुछ दिनों पहले लखनऊ की कमिश्नर डॉ. रोशन जैकब ने गोमती के किनारों से कुछ अतिक्रमण हटवाये थे। डॉ. जैकब के स्थानांतरण के तुरंत बाद से इसमें से एक अतिक्रमण का भूलेख क्षेत्रीय लेखपाल ने अब बदल दिया है। उसका कहना कि पहले गलती से ऐसा हो गया था। इतने दबंग हैं हमारे राजस्व विभाग के लोग, जो कमिश्नर के आदेश को भी बदल दे रहे हैं। इनके ऊपर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। इसी तरह की कार्रवाई प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अफसरों के खिलाफ भी होनी चाहिए। ऐसी कार्रवाईयां जब तक नहीं होंगी, गोमती को स्वच्छ करने के प्रयास अधूरे ही रहेंगे।
अगर गोमती का प्रदूषण नहीं रुका तो यही प्रदूषण आने वाले भविष्य में इस ऐतिहासिक शहर और यहां के निवासियों को नष्ट कर देगा। यह शहर सांस लेने लायक नहीं रह जाएगा। जैसे आज गोमती का दम घुट रहा है, वैसे लखनऊ शहर का दम घुटेगा।
किसी भी नदी के पानी में प्रदूषण का सबसे खतरनाक पहलू पानी में घुलित ऑक्सीजन की मात्रा में भारी कमी आना होता है। गोमती में ऑक्सीजन का स्तर इतना नीचे गिर गया है कि जलीय जीवन के लिए खतरा पैदा हो गया है, जिससे मछलियों की मौत की खबरें अक्सर आती रहती हैं।
एक स्वस्थ नदी जल में डीओ का स्तर 6.5 से 8.0 ग्राम प्रति लीटर होना चाहिए। पानी के जलीय जीवों के लिए यह डीओ स्तर 5.0 ग्राम प्रति लीटर से कम नहीं होना चाहिए। जबकि एक रिपोर्ट के अनुसार लखनऊ में शहीद पथ और कुड़िया घाट के पास डीओ (पानी में घुलित ऑक्सीजन) का स्तर गिरकर 1.5 मिलीग्राम प्रति लीटर या इससे भी कम हो गया है। यह स्थिति जलीय जीवन के लिए बेहद घातक होती है और ‘हाइपोक्सिया’ (ऑक्सीजन की कमी) को दर्शाती है, जिससे मछलियाँ और अन्य जलीय जीव बड़ी संख्या में मर जाते हैं। दूसरी तरफ, बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) और केमिकल ऑक्सीजन डिमांड (सीओडी) दोनों का ही स्तर गोमती में बहुत ज्यादा है जो बड़ी मात्रा में कार्बनिक प्रदूषण का संकेत देता है। गोमती में बीओडी का स्तर 18 मिलीग्राम प्रति लीटर (ये अधिकतम मात्रा है) तक मिला है, जो सामान्य मानक (यह मानक केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मानकों के अनुसार 3 है) से बहुत अधिक है। अध्ययनों में यह भी सामने आया है कि गोमती नदी के पानी में लेड, कैडमियम और क्रोमियम जैसी भारी और घातक धातुओं के साथ फेकल कॉलीफॉर्म बैक्टीरिया के खतरनाक स्तर पाए गए हैं, जो नॉनट्रीटेड सीवेज के नदी में गिरने का परिणाम है।
लखनऊ या गोमती ही नहीं, सब जगह यही हाल
गोमती की यह भयानक तस्वीर सौर्वभौमिक है। लगभग हर नदी की यही स्थिति है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के एक अध्ययन के अनुसार देश भर में 900 से अधिक शहरों और कस्बों का 70 फीसदी गंदा पानी पेयजल की प्रमुख स्रोत नदियों में बिना ट्रीटमेंट के छोड़ दिया जाता है। कारखाने और मिलें भी नदियों को प्रदूषित कर रहे हैं। इनका कचरा निर्बाध रूप से नदियों मेंं गिरकर जीवनदायिनी नदियों को गंदा कर रहा है। इस गंदगी से बचाने के लिए कोई ऐसी पहल नहीं हो रही है, जो प्रभावोत्पादक हो।
प्राचीन समय की परम्पराओं की प्रहरी इन नदियों में पितृ तर्पण, स्नान और अठखेलियां करने वाले लोग अब उनके नजदीक से गुजरने पर नाक-मुंह सिकोड़ लेते हैं। इनकी स्थिति सुधारने के लिए कोई आगे नहीं आता। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार देश की 70 फीसदी नदियां प्रदूषित हैं और कई मरने के कगार पर हैं। इनमें गुजरात की अमलाखेड़ी, महाराष्ट्र की भीमा, हरियाणा की मारकंडा, आंध्रप्रदेश की मुंसी, दिल्ली में यमुना, उत्तर प्रदेश की काली, गोमती और हिंडन नदी सबसे अधिक प्रदूषित हैं।




