उत्तर प्रदेशलखनऊ

बसपा में ‘एकला चलो’ की नीति: अपनों को बाहर का रास्ता दिखा रहीं मायावती, 2027 में वजूद बचाना होगी बड़ी चुनौती?

Lucknow Focus News Desk: उत्तर प्रदेश की सियासत में कभी ‘किंग मेकर’ रहने वाली बहुजन समाज पार्टी (बसपा) आज अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। एक तरफ 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर प्रदेश का सियासी पारा चढ़ा हुआ है, वहीं दूसरी तरफ बसपा सुप्रीमो मायावती की ‘निष्कासन नीति’ ने पार्टी के भीतर खलबली मचा दी है। सवाल यह है कि जब पार्टी को एक-एक नेता को जोड़ने की जरूरत है, तब अपनों को ही बाहर का रास्ता दिखाना क्या 2027 की राह को और मुश्किल नहीं बना देगा?

एक हफ्ते में गिरे कई बड़े विकेट

पिछले कुछ दिनों में मायावती ने पार्टी के कई स्तंभों को ढहा दिया है। निष्कासित होने वाले नेताओं में शामिल हैं।

जय प्रकाश सिंह: बसपा के वरिष्ठ और कद्दावर नेता।

धर्मवीर सिंह अशोक: पूर्व विधायक और जमीन से जुड़े नेता।

सरफराज राईन और उपकार बावरा: युवा चेहरे, जिन्हें भविष्य की उम्मीद माना जा रहा था।

इन सभी के निष्कासन पत्रों में कारण एक ही है पार्टी विरोधी गतिविधियां और अनुशासनहीनता।

अर्श से फर्श पर लाने वाली ‘माया’ स्टाइल

मायावती अपनी अनूठी और सख्त राजनीतिक शैली के लिए जानी जाती हैं। उनके बारे में कहा जाता है कि वे कब किससे नाराज हो जाएं और कब किसे ‘फर्श से उठाकर अर्श’ पर बैठा दें, कोई नहीं जानता। हाल ही में उनके बेहद करीबी शमसुद्दीन राईन के साथ हुआ सलूक इसका प्रमाण है चर्चा है कि महज फोन न उठा पाने की छोटी सी बात पर उन्हें पार्टी से बाहर कर दिया गया।

2012 के बाद से बसपा यूपी की सत्ता से दूर है। कांशीराम के साथ मिलकर पार्टी खड़ी करने वाले पुराने साथी हों या उभरते हुए नए चेहरे, मायावती के अनुशासन के डंडे से कोई नहीं बच सका है।

यह चुनाव बसपा के सियासी वजूद को बचाए रखने का अंतिम अवसर माना जा रहा है। जहां सपा का ‘पीडीए’ और भाजपा का ‘नारी शक्ति’ कार्ड मजबूत हो रहा है, वहां बसपा का नया नेतृत्व तैयार होने के बजाय बिखर रहा है।

क्या भारी पड़ेगी यह सख्ती?

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मायावती के लिए कभी कोई नेता अपरिहार्य नहीं रहा, लेकिन मौजूदा दौर अलग है। आज हाथी पर सवार होने के लिए बड़े नेता कतरा रहे हैं। ऐसे में अपने ही दिग्गजों को बाहर करना कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरा सकता है। यदि 2027 में बसपा अपनी जमीन नहीं बचा पाई, तो उत्तर प्रदेश की द्विध्रुवीय राजनीति (भाजपा बनाम सपा) में ‘तीसरे कोण’ का अस्तित्व पूरी तरह समाप्त हो सकता है।

Also Read: Women Reservation Bill: भाजपा का ‘मास्टर स्ट्रोक’ या विपक्ष के लिए जाल? ‘नारी शक्ति’ के सहारे 2027 की तैयारी में जुटी बीजेपी

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button