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बिहार में वोटर लिस्ट विवाद पर चुनाव आयोग का जवाब- जानबूझकर फैलाई जा रही हैं अफवाहें

Lucknow Focus News Desk: बिहार में वोटर लिस्ट को लेकर मचा सियासी घमासान अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। एक ओर विधानसभा में विपक्ष इस मुद्दे पर सरकार को घेर रहा है, तो दूसरी ओर चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। आयोग ने साफ तौर पर कहा है कि ‘विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया’ (Special Intensive Revision – SIR) को लेकर जानबूझकर अफवाहें फैलाई जा रही हैं, जबकि इसका मकसद मतदाता सूची को शुद्ध करना और फर्जी या डुप्लिकेट नाम हटाना है।

आयोग का पलटवार

चुनाव आयोग ने कोर्ट में दायर हलफनामे में कहा कि SIR के खिलाफ दायर याचिकाएं समय से पहले हैं, और अभी इन पर विचार करने की जरूरत नहीं है। आयोग का तर्क है कि यह एक नियमित प्रक्रिया है, जिसका मकसद बिहार के 7.89 करोड़ वोटरों की सूची को दुरुस्त करना है, न कि किसी समुदाय को निशाना बनाना।

इतना ही नहीं, आयोग ने यह भी आरोप लगाया कि कुछ राजनीतिक दल खुद इस प्रक्रिया में हिस्सा ले रहे हैं और BLO यानी बूथ लेवल अधिकारियों के साथ सहयोग भी कर रहे हैं, लेकिन कोर्ट में इस बात को छिपा लिया गया।

आधार कार्ड पर स्थिति स्पष्ट – जरूरी नहीं, बस सपोर्टिंग दस्तावेज

चुनाव आयोग ने हलफनामे में आधार कार्ड को लेकर भी स्थिति स्पष्ट की है। आयोग के अनुसार, वोटर बनने के लिए आधार कार्ड अनिवार्य नहीं है। यह उन 11 वैकल्पिक दस्तावेजों में शामिल नहीं है, जिनके जरिए पहचान और नागरिकता प्रमाणित करनी होती है। हालांकि, मतदाता इसे एक सपोर्टिंग डॉक्यूमेंट के तौर पर दे सकते हैं।

आयोग ने यह भी जानकारी दी कि अब तक 90 फीसदी से ज्यादा लोगों ने फार्म भरकर जमा कर दिया है, जबकि 18 जुलाई तक केवल 5 फीसदी लोग ही ऐसे बचे थे, जिन्होंने अभी तक फार्म नहीं दिया है।

विवाद की जड़: विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची का विशेष संशोधन

बिहार में वर्ष 2025 के विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर बवाल मचा हुआ है। यह प्रक्रिया 24 जून 2025 को शुरू की गई, जो 25 जून से 26 जुलाई तक चल रही है। BLO द्वारा घर-घर जाकर फार्म बांटे जा रहे हैं और मतदाताओं से पहचान संबंधी दस्तावेज मांगे जा रहे हैं।

हालांकि, इस प्रक्रिया की टाइमिंग को लेकर विपक्ष ने गंभीर सवाल उठाए हैं। राजद, कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का आरोप है कि यह कवायद दलित, पिछड़ा, अति-पिछड़ा और अल्पसंख्यक समुदायों के मतदाताओं को सूची से बाहर करने की साजिश है।

क्या है SIR प्रक्रिया का मकसद?

SIR यानी Special Intensive Revision का उद्देश्य मतदाता सूची को अपडेट और साफ-सुथरा करना है। इस दौरान मृत, डुप्लिकेट, या स्थानांतरित वोटरों के नाम हटाए जाते हैं, जबकि नए पात्र वोटरों के नाम जोड़े जाते हैं।

चुनाव आयोग का दावा है कि यह एक पारदर्शी प्रक्रिया है और इसमें किसी भी समुदाय या वर्ग के साथ भेदभाव नहीं किया जा रहा। आयोग ने सुप्रीम कोर्ट से अपील की है कि इस प्रक्रिया के खिलाफ दायर याचिकाओं को खारिज किया जाए, क्योंकि ये राजनीतिक मंशा से प्रेरित हैं।

आगे क्या?

अब सबकी निगाहें सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी हैं। वहीं, बिहार में इस मुद्दे पर राजनीतिक सरगर्मी तेज बनी हुई है। सवाल यही है कि क्या चुनाव से पहले मतदाता सूची को लेकर उठ रहे विवाद को आयोग पारदर्शिता से सुलझा पाएगा, या यह मुद्दा चुनावी राजनीति की एक बड़ी लड़ाई में तब्दील होगा?

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