लखनऊ

एक शाम गांधी, सरसैयद और शास्त्री के नाम: मौलाना आज़ाद मेमोरियल अकादमी में गूँजा इंसानियत और भाईचारे का पैग़ाम

Lucknow Focus News Desk: मौलाना आज़ाद मेमोरियल अकादमी, लखनऊ की ओर से गांधी पखवाड़े के अंतर्गत ‘एक शाम गांधी, सरसैयद और शास्त्री के नाम’ शीर्षक से एक भव्य मुशायरे एवं कवि सम्मेलन का आयोजन अकादमी के लाइब्रेरी हॉल में किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ शायर बद्र गोरखपुरी ने की, जबकि बुज़ुर्ग शायर विश्वास लखनवी विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। इस साहित्यिक संध्या में शहर के जाने-माने रचनाकारों ने अपनी कविताओं और ग़ज़लों से समां बांध दिया।
कार्यक्रम के आरंभ में अकादमी के महासचिव डॉ. अब्दुल कुद्दूस हाशमी ने स्वागत भाषण देते हुए कहा कि महात्मा गांधी ने सत्य और अहिंसा, सरसैयद अहमद खाँ ने आधुनिक शिक्षा और लाल बहादुर शास्त्री ने सादगी व राष्ट्रसेवा का संदेश दिया था। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि साहित्य और शायरी इन महान मूल्यों को जनमानस तक पहुँचाने तथा देश में राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने का सबसे प्रभावी माध्यम हैं।
रचनाकारों ने दी प्रस्तुतियाँ:
  • डॉ. सुमन सुरभि ने ज़िंदगी के सुख-दुख और यादों को बेहद संवेदनशील अंदाज़ में पेश करते हुए सुनाया कि:-
    “दिल में उठती इन लहरों के कितने ही अफ़साने हैं, मुट्ठी भर मुस्कानें हैं और दर्द कहीं अनजाने हैं।”
  • प्रो. मनीराम सिंह भारतीय ने बदलाव की ज़रूरत और अपनी बात मुखर होकर कहने की अहमियत को रेखांकित किया कि :-
    “मंज़िल पर आकर रुकना मुझे मंज़ूर नहीं, मैं यहीं का नहीं हूँ, अब चलना चाहिए। मुद्दत से बंद खिड़कियाँ अब खुलनी चाहिए, सुनना तो फ़र्ज़ है, कभी कहना भी चाहिए।”
  • नवीन शुक्ला ‘नवीन’ ने इंसानियत को हर प्रकार के धार्मिक आडंबरों से ऊपर रखते हुए अपनी पंक्तियाँ रखीं:-
    “ली पड़ोसी की जान बे-मक़सद, तेरे मज़हब का ज्ञान बे-मक़सद। आदमीयत का दर्द हो दिल में, सजदों के ये निशान भी बे-मक़सद।”
  • वरिष्ठ शायर बद्र गोरखपुरी ने अपने कलाम के ज़रिए समय की विडंबनाओं और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सवाल को प्रमुखता से उठाया:-
    “सूरज की शाह पर होने लगा रोशनी का क़त्ल, अब जुगनू को शमाँ से डर जाना चाहिए।”
  • डॉ. मंसूर हसन ख़ान ने मानवता और जनसेवा को ही इबादत का असली मूल बताते हुए कहा:-
    “असल में अस्ल इबादत है वही पेश-ए-ख़ुदा, डूबते की जान बचाई जाए सजदा छोड़ के।”

  • विशिष्ट मुख्य अतिथि विश्वास लखनवी ने अपने शानदार कलाम से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया:-
    “बहुत दिन बाद लाई खुशनुमा पल ज़िंदगी है, अब यह सर कंधे से अपने कल हटाना, आज रहने दो।”
इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य हिंदी और उर्दू की साझा साहित्यिक परंपरा को बढ़ावा देना तथा महात्मा गांधी, सरसैयद अहमद खाँ और लाल बहादुर शास्त्री के विचारों व आदर्शों को नई पीढ़ी तक पहुँचाना था। कार्यक्रम ने उपस्थित सभी श्रोताओं पर गहरी छाप छोड़ी।

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