इतिहास में आने की खातिर, इतिहास बनाना पड़ता है

घनघोर अंधेरों में जीवन के, इक दीप जलाना होता है,
निष्कंटक कोई भी पथ नहीं, इक कदम बढ़ाना होता है।
मृत्यु भी मरती किस्तों में, थोड़ी-थोड़ी, थोड़ी ही सही,
जीने की आशा की खातिर, विश्वास जगाना होता है।
तपते सूरज से जा कह दो, कुछ और तपे, कुछ और तपे,
उफनी नदियों से जा कह हो, कुछ और बहे, कुछ और बहे।
टूटी किस्ती पर हो सवार, पतवार लिए तैयार हूं मैं,
लहरों-लहरों से जा कह दो, कुछ और चढ़े, कुछ और चढ़े।
मिट्टी में फसलें आएंगी, कुछ स्वेद बहाना पड़ता है,
पत्थर से प्रेम उमड़ता है, कुछ नेह लगाना पड़ता है।
जीवन की आपाधापी में, कितना सब कुछ हम भूल गए,
जख्मों से अश्रु टपकता है, कुछ नेह लगाना पड़ता है।
क्यूं तुझको कोई याद करे, क्यों वक्त अपना बर्बाद करे,
बिखरे फूलों से क्यूं कोई, अपने घर को आबाद करे।
उजड़े गुलशन में कौन पथिक, पल दो पल भी रुकना चाहे,
इतिहास में आने की खातिर, इतिहास बनाना पड़ता है।
‘अर्पिता द्विवेदी’




