‘फुले’ फिल्म में विष्णुपंत और फातिमा शेख जैसे किरदारों की अनदेखी क्यों?


Lucknow Focus News Desk: अनंत महादेवन की फिल्म ‘फुले’ हाल के दिनों में सामाजिक विमर्श के केंद्र में रही है। फिल्म की चर्चा मुख्य रूप से जातीय और सामाजिक सरोकारों को लेकर उठे विवादों पर केंद्रित रही, लेकिन इसके कई ऐतिहासिक और प्रेरणादायक पहलू विमर्श से बाहर रह गए। फिल्म ने न केवल महात्मा ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले के योगदान को दर्शाया, बल्कि उनके सहयोगियों जैसे विष्णुपंत थत्ते और फातिमा शेख जैसे किरदारों को भी प्रकाश में लाया — जो भारतीय शिक्षा क्रांति में मूक लेकिन महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे।
वास्तविकता के करीब फिल्म
फिल्म में दिखाया गया है कि किस तरह 1848 में पुणे की एक दलित बस्ती में पहला स्कूल स्थापित हुआ, जहां विष्णुपंत थत्ते ने निःशुल्क शिक्षक के रूप में योगदान दिया। जब सामाजिक दबाव के कारण उन्हें विद्यालय छोड़ना पड़ा, तो उन्होंने अपने संसाधनों से किताबें खरीदकर स्कूल को दान दीं। यह सहयोग फुले दंपत्ति के लिए केवल सहारा नहीं, बल्कि उनके मिशन की दिशा में मजबूत कंधा था।
फातिमा शेख: मुस्लिम समाज में शिक्षा की अलख जगाने वाली पहली महिला
इसी तरह फिल्म में फातिमा शेख का भी उल्लेखनीय योगदान दिखाया गया है। सावित्रीबाई फुले के साथ मिलकर उन्होंने न केवल लड़कियों को शिक्षित किया, बल्कि मुस्लिम बस्तियों में जाकर उर्दू और अंग्रेज़ी पढ़ाने का कार्य शुरू किया। उन्हें भी सामाजिक रूढ़ियों और दबावों का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने कभी अपने कदम पीछे नहीं खींचे। यही वजह है कि उन्हें भारत की पहली मुस्लिम शिक्षिका माना जाता है।
समाज सुधार एक साझा प्रयास था
फिल्म में यह स्पष्ट रूप से दिखाया गया है कि शिक्षा का आंदोलन केवल एक जाति या समुदाय तक सीमित नहीं था। उस्मान शेख, फातिमा, और विष्णुपंत जैसे किरदार यह साबित करते हैं कि सामाजिक सुधार की यह लड़ाई कई जातियों, वर्गों और धर्मों के प्रगतिशील लोगों ने मिलकर लड़ी। यह आंदोलन किसी एक समूह के खिलाफ नहीं था, बल्कि एक पुरानी सोच के खिलाफ था जो समाज को बाँटती थी।
बड़ौदा राजघराने का सहयोग
इतिहास यह भी बताता है कि बड़ौदा के गायकवाड़ राजघराने ने भी फुले दंपत्ति के मिशन में सहयोग दिया। अकाल और महामारी के समय उन्हें अनाज व संसाधनों से मदद की गई, और बाद में ‘महात्मा’ की उपाधि भी दी गई।
फिल्म ‘फुले’ को केवल विवादों के चश्मे से देखना उचित नहीं है। यह एक ऐसी ऐतिहासिक कहानी को सामने लाती है, जो बताती है कि सामाजिक बदलाव एकजुट प्रयासों से आता है। फुले दंपत्ति के साथ विष्णुपंत और फातिमा जैसे किरदार इस बदलाव की सच्ची तस्वीर हैं, जिन्हें अब तक नज़रअंदाज़ किया गया।
यह ज़रूरी है कि इन योगदानों को पहचान मिले — न केवल इतिहास में, बल्कि वर्तमान समाज में भी।



