लखनऊ से निकली एक सोच अब समूची दुनिया के लिए बन रही प्रेरणा
“साफ़ सहेली”, एक ऐसी जैविक सैनिटरी नैपकिन, जो इस्तेमाल के बाद खुद ही सड़कर खाद बन जाती है

आज हमारे चारों ओर बायो-वेस्ट यानी जैविक कचरे की मात्रा लगातार बढ़ रही है। हर शहर, हर गली, हर कॉलोनी में कूड़े के ढेर दिखाई देते हैं। हर कोई कहता है कि हमें अपने आसपास का कचरा सही तरीके से निस्तारित करना चाहिए, लेकिन हकीकत यह है कि हमारी व्यवस्था इतनी सुदृढ़ नहीं है कि वह इस समस्या को पूरी तरह नियंत्रित कर सके। बढ़ते हुए इस जैविक कचरे में एक बड़ा हिस्सा आता है इस्तेमाल किए गए सैनिटरी नैपकिन्स का, जो खुले में, नालियों में या कूड़े के ढेरों में पड़े मिल जाते हैं। अक्सर ये इस्तेमाल किए गए नैपकिन्स कुत्तों द्वारा इधर-उधर फैला दिए जाते हैं, जिससे सड़कों और गलियों में गंदगी फैलती है और सामाजिक व स्वास्थ्य संबंधी खतरे पैदा होते हैं। इनमें मौजूद प्लास्टिक और रासायनिक परतें इन्हें सैकड़ों साल तक न सड़ने वाला बना देती हैं। यही कारण है कि आज सैनिटरी नैपकिन पर्यावरण प्रदूषण का एक गंभीर और अनदेखा हिस्सा बन गए हैं।
सामान्यतया उपयोग में आने वाले सैनिटरी नैपकिन्स में प्लास्टिक, जेल और सिंथेटिक कपड़े का प्रयोग होता है। इन्हें जलाना भी मुश्किल होता है, क्योंकि जलाने पर जहरीली गैसें निकलती हैं। जबकि इन्हें मिट्टी में दबाने से मिट्टी की गुणवत्ता खराब होती है। यही नहीं, ये नालियों को बंद करते हैं, जलाशयों में तैरते रहते हैं और पशुओं तथा पर्यावरण दोनों के लिए हानिकारक साबित होते हैं। ऐसे में जरूरत थी- किसी ऐसे समाधान की जो न केवल महिलाओं की स्वच्छता और सुविधा का ध्यान रखे, बल्कि पर्यावरण की सुरक्षा भी सुनिश्चित करे।
इसी दिशा में एक नई पहल की है लखनऊ की एक उभरती हुई कंपनी Krishigence Pvt. Ltd. (कृषिजेंस प्राइवेट लिमिटेड) ने। इस स्टार्टअप ने एक ऐसा उत्पाद तैयार किया है, जिसने समाज और विज्ञान दोनों में नई हलचल मचा दी है। यह उत्पाद है “साफ़ सहेली”, एक ऐसा जैविक सैनिटरी नैपकिन, जो इस्तेमाल के बाद खुद ही सड़कर खाद में बदल जाती है। यह न केवल पूरी तरह से बायोडिग्रेडेबल है, बल्कि यह दुर्गंध को नियंत्रित करता है और संक्रमण को भी रोकता है, क्योंकि इसमें ऐसे steriliser microbes मौजूद हैं, जो अन्य हानिकारक जीवाणुओं की वृद्धि को रोकते हैं। इसके साथ ही यह आसपास के अन्य जैविक पदार्थों के विघटन (composting) की प्रक्रिया को भी तेज करता है। यह क्रांतिकारी उत्पाद महिलाओं की सेहत, स्वच्छता और प्रकृति की सुरक्षा – तीनों को एक साथ जोड़ता है।
लखनऊ के इंदिरा नगर स्थित Krishigence Pvt. Ltd. की प्रबंध निदेशक श्रीमती विजया सिंह हैं। इस कंपनी की टीम ने वर्षों के शोध के बाद ऐसा सैनिटरी नैपकिन विकसित किया है, जो इस्तेमाल के बाद किसी बोझ की तरह नहीं, बल्कि मिट्टी के लिए पोषक बन जाता है। साफ़ सहेली में एक छोटा सा माइक्रोबियल टैबलेट होता है, जो इस पूरी प्रक्रिया की आत्मा है। यह टैबलेट नैपकिन के अंदर सुरक्षित रूप से रखा होता है। जब नैपकिन का उपयोग समाप्त हो जाए, तब उपयोगकर्ता को इस टैबलेट को हल्के से दबाकर तोड़ना होता है। जैसे ही यह टैबलेट टूटती है, इसमें मौजूद विशेष प्रकार के लाभकारी सूक्ष्मजीव सक्रिय हो जाते हैं।
ये सूक्ष्मजीव प्राकृतिक रूप से मिट्टी में पाए जाने वाले विघटनकारी जीवाणुओं (decomposer bacteria) की तरह काम करते हैं। वे नैपकिन के अंदर मौजूद जैविक पदार्थों को छोटे-छोटे भागों में तोड़ना शुरू कर देते हैं। धीरे-धीरे वे सेल्यूलोज़, स्टार्च और प्राकृतिक पॉलिमर जैसे तत्वों को विघटित कर देते हैं। इस प्रक्रिया के परिणामस्वरूप नैपकिन कुछ ही दिनों में पूरी तरह सड़ जाती है और उससे एक जैविक खाद तैयार होती है, जो मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में मदद करती है।
साफ़ सहेली को तैयार करने की प्रक्रिया पूरी तरह वैज्ञानिक और इको-फ्रेंडली है। इसका ऊपरी हिस्सा ऑर्गेनिक कॉटन से बनाया गया है, जो त्वचा के लिए कोमल और सुरक्षित है। बीच की परत में प्राकृतिक पौधों से प्राप्त अवशोषक (एब्ज़ॉर्बेंट) जेल होता है, जो बिना किसी रासायनिक प्रभाव के तरल को सोख लेता है। नीचे की परत बायोपॉलिमर से बनी होती है, जो सामान्य प्लास्टिक के विपरीत पूरी तरह बायोडिग्रेडेबल है। इस पूरी संरचना के साथ अंत में जो माइक्रोबियल टैबलेट डाली जाती है, वह इसे स्वतः विघटनशील (self-decomposing) सैनिटरी नैपकिन में बदल देती है।
इस टैबलेट में Bacillus subtilis, Pseudomonas fluorescens और Actinomycetes जैसे जीवाणु शामिल हैं, जो जैविक पदार्थों को तेजी से विघटित करने में सक्षम हैं। यह टैबलेट जैसे ही नमी और हवा के संपर्क में आती है, जीवाणु तेजी से बढ़ने लगते हैं और अपना काम शुरू कर देते हैं। परिणामस्वरूप, इस्तेमाल की गई नैपकिन किसी दुर्गंध या प्रदूषण के बिना 10 से 15 दिनों में खाद में बदल जाती है।
इस उत्पाद का उपयोग बेहद आसान है। सामान्य रूप से नैपकिन का उपयोग करें और जब उसे फेंकना हो, तो उसे उसी पैकेट में वापस रख दें, जिससे आपने उसे निकाला था और पैकेट के बाहर से हल्के हाथों से टैबलेट को दबाकर तोड़ दें। इसके बाद आप इसे सामान्य कचरे के साथ फेंक सकते हैं या अपने घर के लॉन, बगीचे या किसी जैविक कचरे के गड्ढे में डाल सकते हैं। कुछ ही दिनों में यह नैपकिन स्वयं सड़ जाएगी और अन्य जैविक कचरे के कंपोस्टिंग को भी बढ़ावा देगी। यह उत्पाद घरों, स्कूलों, कॉलेजों, कार्यालयों और सार्वजनिक स्थानों पर आसानी से अपनाया जा सकता है।
साफ़ सहेली का प्रभाव केवल पर्यावरणीय नहीं बल्कि सामाजिक भी है। भारत में हर महीने करोड़ों की संख्या में सैनिटरी नैपकिन्स उपयोग में आते हैं, जिनका अधिकांश हिस्सा निस्तारित नहीं हो पाता। हर साल लाखों टन ऐसा कचरा उत्पन्न होता है जो भूमि और जल दोनों के लिए हानिकारक है। लेकिन साफ़ सहेली इस समस्या को जड़ से हल कर देती है। यह महिलाओं को सुविधा देती है, स्वच्छता प्रदान करती है और धरती को प्रदूषण से मुक्त करती है।
इसके अतिरिक्त, साफ़ सहेली ग्रामीण महिलाओं और स्वयं सहायता समूहों के लिए भी एक अवसर लेकर आई है। Krishigence Pvt. Ltd. अब ऐसे महिला समूहों को प्रशिक्षण दे रही है ताकि वे अपने क्षेत्र में इस उत्पाद का निर्माण और वितरण कर सकें। इससे महिलाओं को न केवल आत्मनिर्भरता मिलेगी बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी।
साफ़ सहेली एक उत्पाद से बढ़कर एक सोच है — ऐसी सोच जो “स्वच्छता और सतत विकास” को एक सूत्र में बांधती है। यह उत्पाद भारत सरकार के “स्वच्छ भारत मिशन” और “मेनस्ट्रुअल हाइजीन मिशन” जैसे अभियानों से भी जुड़ता है। साथ ही यह संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों (SDG 6, 12 और 13) का भी प्रत्यक्ष समर्थन करता है।
Krishigence Pvt. Ltd. के संस्थापक और तकनीकी निदेशक श्री जितेन्द्र कुमार सिंह, जो स्वयं एक मशरूम टेक्नोलॉजिस्ट और माइक्रोबायोलॉजिस्ट हैं, बताते हैं कि इस उत्पाद को तैयार करने का उद्देश्य केवल एक नया बाजार बनाना नहीं, बल्कि पर्यावरण और समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाना है। उनका मानना है कि अगर विज्ञान का उपयोग समाज की बुनियादी समस्याओं को हल करने में हो, तो उसका प्रभाव पीढ़ियों तक महसूस किया जा सकता है।
आज साफ़ सहेली सिर्फ़ एक जैविक नैपकिन नहीं है, बल्कि यह बदलाव की दिशा में एक क्रांति है। यह महिलाओं की गरिमा को बनाए रखते हुए धरती को राहत देती है। जब कोई महिला साफ़ सहेली का उपयोग करती है, तो वह केवल अपनी सेहत का ख्याल नहीं रखती, बल्कि वह धरती की सेहत का भी ध्यान रखती है।
एक छोटा सा टैबलेट, एक छोटी सी सोच और एक बड़ा परिवर्तन — यही है साफ़ सहेली की कहानी। आज जब पूरी दुनिया पर्यावरणीय संकट से जूझ रही है, ऐसे में Krishigence Pvt. Ltd. जैसी कंपनियाँ उम्मीद की किरण बनकर उभर रही हैं। साफ़ सहेली न केवल जैविक समाधान प्रदान करती है, बल्कि यह संदेश भी देती है कि परिवर्तन की शुरुआत हमेशा एक छोटे कदम से होती है।
लखनऊ से निकली यह सोच अब पूरे भारत और विश्व के लिए प्रेरणा बन रही है। यह साबित करती है कि अगर इच्छा हो तो एक छोटा नवाचार भी लाखों ज़िंदगियों में बदलाव ला सकता है। साफ़ सहेली के साथ, हर महिला अब कह सकती है — “मैं और मेरी साफ़ सहेली, दोनों प्रकृति के साथ हैं।”




