आयुर्वेद का वरदान ‘अभ्यंग’: जानें बच्चों की मालिश शुरू करने की सही उम्र और इसके बेमिसाल फायदे

Lucknow Focus News Desk: भारतीय संस्कृति और आयुर्वेद में नवजात शिशु की देखभाल के लिए ‘अभ्यंग’ यानी तेल मालिश को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। विशेषज्ञों के अनुसार, जन्म के शुरुआती कुछ साल बच्चे के संपूर्ण विकास के लिए आधारशिला होते हैं। विशेषज्ञों मुताबिक, मालिश केवल एक शारीरिक क्रिया नहीं, बल्कि बच्चे के स्वास्थ्य और माँ के साथ उसके भावनात्मक जुड़ाव का एक सशक्त माध्यम है।
मालिश करने के प्रमुख फायदे
वात दोष का संतुलन: जन्म के समय शिशुओं में ‘वात’ का प्रभाव अधिक होता है, जिससे उनमें बेचैनी या कमजोरी हो सकती है। नियमित मालिश से वात दोष संतुलित होता है और बच्चा शांत महसूस करता है।
हड्डियों और मांसपेशियों में मजबूती: तेल मालिश से रक्त संचार (Blood Circulation) बेहतर होता है। इससे शरीर के सभी अंगों तक जरूरी पोषक तत्व पहुंचते हैं, जिससे हड्डियां मजबूत और मांसपेशियां लचीली बनती हैं।
बेहतर पाचन और रोग प्रतिरोधक क्षमता: छोटे बच्चे शारीरिक रूप से सक्रिय नहीं होते, ऐसे में मालिश उनके पाचन तंत्र को सुचारू रखती है। इससे पेट दर्द, गैस और कब्ज जैसी समस्याओं में राहत मिलती है और इम्यूनिटी बढ़ती है।
गहरी नींद और मानसिक विकास: शोध बताते हैं कि नियमित मालिश वाले बच्चे अधिक गहरी और सुकून भरी नींद लेते हैं, जो उनके मस्तिष्क के विकास के लिए अनिवार्य है।
किस उम्र में शुरू करें मालिश?
अक्सर माता-पिता जन्म के तुरंत बाद मालिश शुरू कर देते हैं, जो गलत हो सकता है। बच्चे की मालिश जन्म के 2 से 3 हफ्ते बाद या जब बच्चा 1 महीने का हो जाए, तब शुरू करनी चाहिए। जन्म के तुरंत बाद त्वचा अत्यंत संवेदनशील होती है, जिससे संक्रमण या रैशेज का खतरा रहता है।
मौसम के अनुसार तेल का चुनाव
सर्दी का मौसम: तिल या सरसों के तेल का प्रयोग करें, क्योंकि इनकी तासीर गर्म होती है।
गर्मी का मौसम: नारियल तेल का इस्तेमाल सबसे बेहतर है, क्योंकि यह त्वचा को ठंडक और पोषण देता है।
इन बातों का रखें विशेष ध्यान
मालिश के दौरान बच्चे के नाजुक शरीर पर अधिक दबाव न डालें।
मालिश के बाद हमेशा गुनगुने पानी से ही बच्चे को नहलाएं।
यदि बच्चे को त्वचा संबंधी कोई समस्या हो, तो मालिश करने से पहले डॉक्टर की सलाह अवश्य लें।
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