Census : 1947 की जनगणना में देश की कैसी थी तस्वीर और अब कैसे हैं हालात?

Lucknow Focus News Desk: आज़ादी के 78 साल बाद देश एक बार फिर इतिहास रचने जा रहा है। केंद्र सरकार जल्द ही 16वीं जनगणना कराने की तैयारी में है, जो कई मायनों में बेहद विशेष और ऐतिहासिक होगी। इस बार की जनगणना पूरी तरह डिजिटल होगी, और खास बात ये है कि इसके साथ ही सरकार जातिगत जनगणना भी करवाने जा रही है ऐसा 16 सालों में पहली बार होगा।
लेकिन क्या आप जानते हैं कि आज़ादी के बाद जब देश में पहली बार जनगणना कराई गई थी, तो देश की आर्थिक और सामाजिक हालत कैसी थी? आइए, जानते हैं कि उस दौर में भारत कैसा था और अब तक हम कहां पहुंचे हैं।
1947 की जनगणना में देश की तस्वीर कैसी थी?
जब 1947 में भारत आज़ाद हुआ, तब देश की कुल आबादी महज 34 करोड़ थी।
अब यह आंकड़ा 140 करोड़ से ज्यादा हो चुका है यानी 78 सालों में आबादी 100 करोड़ से अधिक बढ़ गई।
आज़ादी के समय एक आम व्यक्ति की सालाना आय सिर्फ ₹280 के आसपास थी। आज यह आंकड़ा ₹1.30 लाख तक पहुंच चुका है।
यदि तुलना करें तो आज के दौर में लोग एक बार की डिनर पार्टी में जितना खर्च कर देते हैं, उतना तब पूरा सालभर में कमाया जाता था।
आज़ादी के समय देश में कितनी थी गरीबी?
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, आज़ादी के समय लगभग 25 करोड़ लोग गरीबी में जी रहे थे, यानी कुल जनसंख्या का करीब 80% हिस्सा गरीब था।
हालांकि, आधिकारिक तौर पर गरीबी के आंकड़े 1956 से दर्ज किए जाने लगे, जब बी.एस. मिन्हास समिति ने योजना आयोग को अपनी रिपोर्ट सौंपी।
उस रिपोर्ट में बताया गया था कि 21.5 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन कर रहे थे।
अब कौन है गरीब? जानिए सरकारी पैमाना
यूपीए सरकार के कार्यकाल में बनी रंगराजन कमेटी के अनुसार:
शहर में ₹47 प्रतिदिन से कम खर्च करने वाला व्यक्ति गरीब माना जाएगा।
गांव में ₹32 प्रतिदिन से कम खर्च करने वाला व्यक्ति भी गरीब की श्रेणी में आएगा।
हालांकि इस परिभाषा को लेकर काफी विवाद भी हुआ था।
एक और मानक के अनुसार:
अगर कोई शहरी नागरिक ₹1,000 प्रति माह कमा रहा है या
कोई ग्रामीण नागरिक ₹816 प्रति माह, तो उसे गरीब नहीं माना जाएगा।
वर्तमान में गरीबी का क्या हाल है?
सरकार के पास मौजूद ताज़ा आंकड़े 2011-12 के हैं।
इन आंकड़ों के अनुसार, देश में अभी करीब 26.9 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं।
जनगणना 2025 की ओर बढ़ते कदम
आने वाली जनगणना भारत की अब तक की सबसे तकनीकी और व्यापक जनगणना होगी।
पहली बार डिजिटल प्लेटफॉर्म और मोबाइल एप्लिकेशन का इस्तेमाल किया जाएगा।
जातिगत जनगणना से यह समझने में मदद मिलेगी कि समाज में कौन-कौन सी जातियां कहां और किस स्थिति में हैं।
भारत ने जनगणना के सफर में एक लंबा रास्ता तय किया है। कभी एक थैली में फार्म भरकर गांव-गांव घूमते कर्मचारी होते थे, अब डिजिटल डिवाइसेज़ और डेटा एनालिटिक्स के जरिए देश की सामाजिक-आर्थिक तस्वीर बनेगी। लेकिन, गरीबी का चेहरा आज भी पूरी तरह नहीं बदला है। नई जनगणना उम्मीदें जगा रही है कि डिजिटल भारत अब सटीक और समावेशी नीतियों की दिशा में एक और कदम बढ़ाएगा।
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