विशेष

लोक आस्था एवं सामाजिक सरोकार का महापर्व छठ

-पवन कुमार पांडेय

दशहरे के बाद ही छठ महापर्व अपने आगमन का दस्तक दे देती है और जो जहां है वहीं से अपनी मिट्टी की ओर खिंचा चला आता है । भले ही शरीर से ना आ पाए लेकिन मन से अपने गांव जरूर पहुंच जाता है इसे चाहे अपनी मिट्टी से लगाव कहे या अपनी जिंदगी का अभिन्न हिस्सा बन चुकी अपनी संस्कृति ।

जी हां  छठ

छठ केवल त्योहार नहीं बल्कि हमारी संस्कृति एवं  हमारे मूल्यों का दर्पण है ।

कुछ मजबूरियां कभी-कभी आड़े आ जाती है नहीं तो छठ और होली तो बस अपने मिट्टी में ही भाता है।

अगर बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश को समझना है तो एक बार उनके छठ में जरूर शरीक हो नहीं तो आपकी मन में, आपके भाव में जो एक छवि से बनी हुई है वह कभी नहीं मिटेगी।

बिहार एवं पूर्वी उत्तर प्रदेश में छठ केवल एक त्यौहार के रूप में नहीं बल्कि यह उनकी अपनी एक धरोहर है, विरासत है जिसे पीढ़ी दर पीढ़ी हम अपनी झोली में संभाल कर रखते हैं जहां ना कोई भेदभाव, ना जाति का बंधन, ना आय की रेखा, सभी एक साथ एक ही समय पर अपने सामाजिक ताना-बाना से संग्रहित पूजन सामग्री के साथ अस्ताचल सूर्य को अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं ।

दुनिया में शायद ही कोई ऐसी संस्कृति हो जो ढलने के बाद किसी के सामने नतमस्तक होने को कहती है। लेकिन जिसे हम पिछड़े, जिसे हम बेकार समझते है उसकी संस्कृति एवं मूल बिना लाभ-हानि की है जो किसी भी संबंध को चंद समय ही नहीं बल्कि जन्म जन्म तक निभाती है ।

दुनिया की हर व्यवस्था में संबंध का आधार लाभ,  हानि एवं उपयोगिता ही है। लेकिन केवल बिहारी परंपरा में ही निस्वार्थ संबंध को अपनी परंपरा के रूप में न केवल मानती है बल्कि उसकी आराधना करती है इसका स्पष्ट उदाहरण है अस्तांचल सूर्य के समक्ष श्रद्धांभाव से नतमस्तक होना ।

हमारा त्योहार केवल जश्न मनाने का माध्यम नहीं है बल्कि यह हमारी सोच संस्कृति समाजिक संरचना को परिलक्षित करती है।

आज जब गैस चूल्हा सहज उपलब्ध है तब भी सदियों  से हम मिट्टी का चूल्हा  बनाते है। आज भी हम बांस के सूप का प्रयोग करते है। तमाम फल हम पूजा मे उपयोग करते हैं  लेकिन  सूथनी, नींबू  चावल और गुड का बनी मिठाई के बिना यह पूजा हो ही नहीं सकता । हम पहले  डूबते सूर्य को नमन करते है फिर हम उगते सूर्य को।

बांस का  सूप हमारी सामाजिक समरसता को बताता है । हमारे इस महापर्व मे पुरोहित की कोई भूमिका नहीं होती है  जो हमारे बिहारी समाज के एकरूपता को बताता है । दुनिया की हर परंपरा उगते सूर्य को नमन करता है लेकिन इस महापर्व में  हम डूबते सूर्य को पहले  नमन करते है । आज भी हम यह पर्व प्रकृति के साथ मनाते है जो प्रकृति के प्रति हमारी जवाबदेही को दिखाता है ।

लेकिन अफसोस  बिहारी शब्द का इस्तेमाल महज एक अपमान के रूप में ही किया जाता है खैर हो भी क्यों ना जब आप अपनों को अपमानित करेंगे जब आप केवल उसे इस्तेमाल की वस्तु समझेंगे हर पल तिरस्कृत करने का बहाना ढूंढ लेंगे तो कोई और क्यों नहीं करेगा। पहले आप अपनों को सम्मान दीजिए फिर देखिए कैसे दुनिया आपके साथ होती है।

बिना किसी भेदभाव के एक साथ घाटों पर यह पर्व मनाते है जो कि अविस्मरणीय क्षण होता है । एक बार जिस संरचना में हम छठ महापर्व मनाते हैं उसी संरचना में एक साल रहे तो ना हम गुजरात से भगाये जायेगे ना ही  राज ठाकरे की गीदड भभकी सुनना पडेगा ।

आये गुमान  करे अपने बिहार, बिहारी और बिहारीपन पर फिर देखे लोग कैसे नमन करते है ।

(लेखक लोक संस्कृति के अध्येता हैं।)

(फोटो-साभार सोशल मीडिया)

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