बिहार में चुनाव आयोग के SIR पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी, दस्तावेज़ों की सूची पर उठा विवाद

Lucknow Focus News Desk: बिहार में चुनाव आयोग द्वारा लागू किए गए Special Identification Requirement (SIR) को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में लगातार दूसरे दिन सुनवाई हुई। जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि SIR के नियम बहुत सख्त नहीं हैं, और मतदाता के लिए केवल एक मान्य दस्तावेज़ पर्याप्त होगा।
विपक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील दी कि SIR पर उन्हें कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन इसका क्रियान्वयन चुनाव से ठीक पहले क्यों किया जा रहा है, यह सवाल है।
उन्होंने झारखंड के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी का 3 सितंबर 2024 का हलफ़नामा पढ़ते हुए कहा कि नागरिकता को लेकर संदेह की स्थिति में निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ERO) गृह मंत्रालय सहित संबंधित प्राधिकारियों से परामर्श ले सकता है, और आवश्यकता होने पर पहले से मौजूद लाल बाबू मामले के सर्वोच्च न्यायालय दिशानिर्देशों को देखना चाहिए।
दस्तावेज़ों की सूची और कवरेज पर बहस
सुनवाई के दौरान जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि कानून में कोई रोक नहीं है कि 50 वर्ष की उम्र का व्यक्ति भी पहचान प्रमाण पत्र ले सके। इस पर सिंघवी ने सवाल किया कि जुलाई में अचानक इस अभ्यास को शुरू करने की इतनी जल्दबाज़ी क्यों है। उन्होंने तर्क दिया कि बिहार के ग्रामीण और बाढ़ग्रस्त इलाकों में लोगों के पास जरूरी दस्तावेज़ जुटाना कठिन है, खासकर महिलाओं के लिए।
सिंघवी ने बताया कि EPIC (मतदाता पहचान पत्र) और आधार, दोनों ही व्यापक कवरेज वाले दस्तावेज़ हैं, लेकिन SIR में आधार को शामिल नहीं किया गया है। अन्य दस्तावेज़ जैसे पानी, बिजली, गैस कनेक्शन बिल भी सूची में नहीं हैं, जबकि भारतीय पासपोर्ट का कवरेज राज्य में 1-2% से भी कम है। भूमि संबंधी दस्तावेज़ों पर भी सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि राज्य में निवास प्रमाण पत्र आमतौर पर उपलब्ध नहीं है, जबकि मतदाता पंजीकरण के लिए फॉर्म-6 में केवल स्व-घोषणा पर्याप्त होती है।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां
जस्टिस बागची ने कहा कि चुनाव आयोग दस्तावेज़ों की संख्या 7 से बढ़ाकर 11 कर रहा है, जिससे मतदाताओं के पास अधिक विकल्प उपलब्ध होंगे। उनका कहना था कि यह बदलाव मतदाता-अनुकूल है और पहचान के विकल्प को सीमित करने के बजाय बढ़ाता है।
जस्टिस सूर्यकांत ने भी स्पष्ट किया कि यदि किसी मतदाता से सभी 11 दस्तावेज़ मांगने की बात कही जाए तो यह मतदान-विरोधी होगा, लेकिन यदि नियम कहता है कि इन 11 में से कोई एक भी दस्तावेज़ पर्याप्त है, तो यह सुविधा बढ़ाने वाला कदम माना जाएगा।
सुनवाई जारी है और अदालत आने वाले दिनों में इस मामले पर विस्तृत आदेश दे सकती है।