न रख पाये सहेज कर तुम…टूटकर बिखर रही हूँ अब कतरा कतरा

-निहारिका गौड़
आहिस्ता-आहिस्ता पेशे-नज़र पुरानी याद बन कर इतिहास में दाख़िल हो जाना ही मेरी नियति है । लखनऊ के विषय में आदरणीय योगेश प्रवीन जी की किताबों को पढ़कर जाना और इमारतों के करीब पहुँचकर उस इतिहास को महसूस किया । एक जमाने में लखनऊ को लख़ौड़ियों का किला कहा जाता था क्यूँकि यहाँ अदना मकान से लेकर सुन्दर , आलीशान भूलभुलैया जैसी विश्वविख्यात इमारतें लख़ौड़ियों से ही बनी है । मन भर पकाया गया होगा इन लख़ौड़ियों को , तब कहीं जा कर बनी होंगीं मज़बूत इमारतें । आज जो कुछ इमारतें ऐतिहासिक धरोहर के रूप में शेष हैं तो इसका श्रेय उनकी मज़बूत बनावट को ही जाता है….
” इक-इक ईंट जोड़कर शौक़ से संवारा गया होगा
बडे़ सलीक़े से इन मेहराबों को निखारा गया होगा
फ़िर चली, कुछ वक़्त की आंधियाँ ऐसी
बस दास्तान-ए-याद बनकर रह गया मेरा वजूद ..”
अपनी धरोहरों की बाबत लखनऊवासियों की उदासीनता ने बार-बार शर्मसार ही किया है, थोड़ी वक़्त ने भी निर्ममता दिखायी । सन् 1857 की क्रांति में लखनऊ के पहलू में भयंकर तोड़-फोड़ हुई , जिसमें तमाम इमारतें नष्ट हुई । चूंकि कानून व्यवस्था भी ध्वस्त हो गयी, इसलिए बहुत सी इमारतों पर नाजायज़ कब्जे भी हुए जो तमाम जगहों पर आज भी मौजूद हैं।
बहरहाल इन सारी परिस्थितियों के बावजूद सन् 1880-82 के आस-पास लखनऊ को सजाने संवारने का काम शुरू हुअा । इस काम में पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग , हुसैनाबाद ट्रस्ट और कई अन्य सरकारी महकमे लगाए गए । लेकिन इन सभी के सम्मलित प्रयासों के बावजूद नतीज़ा लगभग सिफर रहा । मुख़्तसर सी बात है कि अनमोल धरोहरों के पुनरुद्धार का काम लम्बे समय से जारी है लेकिन वो इमारतें कहीं ज़्यादा सुन्दर व संरक्षित हैं, जिनका पुरसानेहाल कोई नहीं । दरअसल अपनी धरोहरों की बेकद्री के लिये हम स्वयं ही तो ज़िम्मेदार हैं ।
“लखनऊ तेरी गलियों का मुक़द्दर है यही
हर गली ख़ाक-ए-बशर आज नज़र आती है “
भूलभुलैया के पर्शियन हॉल में गूँजती माचिस व कागज़ की आवाज़े अब ख़ामोश हैं , रूमी गेट ( तुर्की दरवाजा ) आज असहाय खड़ा उम्मीद भरी नज़रो से अपनी ही रहगुज़र से निहार रहा हर राहगीर को । एक-एक कर बाउली की तीन छतें जर्जर हो अपने ही आँसुओ में डूब रहीं । शाही नौबतखाने पर निगाह उठा के देखने की नौबत कहाँ कर सका कोई । जिस शाही रसोई में आवाम के लिये भोजन पकता था जो खास तारीखों में बाँटा जाता था, आज बदहाल है । छोटा इमामबाड़ा (पैलेस ऑफ़ लाइट) के गेट के पास शाही हमामखाने में लगा दुनिया का पहला शॉवर अब सूख चुका । ये तो चंद इमारतों की ख़ामोश सी दास्तान है बस । आँखो के आँसू तो सूख चले , अब उठेगा चिता से धुँआ देर तलक। एतमाद टूट गया ….
“किस उम्मीद पे फ़िर से तसव्वुर सजे कोई
कहीं अब्र – ए – रहमत नज़र आता नहीं “
ऐसे में हम केवल यही कह सकते हैं कि अब हमारे पास जो धरोहर बची हैं उसके लिये अपने बुजुर्गों के शुक्रगुज़ार रहें …और जो चली गयी उसके लिये शर्मसार हों …….
“इक मासूम सी ख़्वाहिश ,
इन खण्डहरो से फ़िर से जुड़ने की,
इस एकान्त में फ़िर से जीने की …
ख़ुदा आबाद रखे ये अनमोल सौगातें
कभी यहाँ ज़िन्दगी रहा करती थी ……।”
(फोटो साभार-सोशल मीडिया)




