डॉ. शंभु नाथ : काल से साक्षात्कार करते-करते ली अंतिम विदाई
डॉ. अमिता दुबे
डॉ. शंभु नाथ एक संवेदनशील रचनाकार के रूप में समादृत हैं। साहित्यिक यात्रा का शुभारम्भ आपने कविता से किया। यद्यपि आपका काव्य संग्रह बाद में प्रकाशित हुआ। कविता करने की प्रेरणा आपको प्रकृति एवं परिवेश से मिली। प्रायः आस-पास की घटनाएँ आपको प्रभावित करती रहीं। आपको पारिवारिक वातावरण का भी सहयोग मिला। आपने बचपन से ही हिन्दी साहित्य के अवसरों से भी उनसे स्मृति और प्रेरणा ग्रहण की।
डॉ. शंभु नाथ जी ने गद्य और पद्य दोनों में रचनाएं की हैं। आपका मानना है कि दोनों विधाएं अपने-अपने स्थान पर महत्वपूर्ण होती हैं, क्योंकि दोनों के कारण एवं समय अलग-अलग होते हैं। जब कविता जोर पकड़ती है, तब गद्य लिखना असम्भव हो जाता है। गम्भीर क्षणों में कविता रचने का प्रयास निष्फल होता है। कविता की सृजन का मूल कारण क्या है, इसके सैद्धान्तिक प्रश्न के उत्तर में डॉ॰ शंभु नाथ कहते हैं – ‘‘कभी मुझे कोई विशेष प्रेरणा या विषय लेकर कविता लिखने का प्रयत्न हुआ ही नहीं। मात्र किसी के आग्रहवश कविताएं लिखी नहीं हैं। इसलिए जब कभी भीतर की कोई पीड़ा पूरी नहीं हो पाती और शब्द और स्वर बनकर उभरती है तो कविता लिख गये।’’
डॉ. शंभु नाथ जी का मानना है कि भावावेग प्रबल हो तो अभिव्यक्ति कविता का आकार लेती है। इसी प्रकार साहित्य के सन्दर्भ में विचारों का आवेग प्रबल हो तो समीक्षा जन्म लेती है। समीक्षा लिखने में आप गतानुगतिकता से बचते रहे हैं और प्रायः आपकी यह चेतना रहती है कि कोई ऐसी बात कहें जो अब तक अनकही रही हो। आपकी संवेदना कविता और समीक्षा दोनों के साथ समान रूप से जुड़ी है। आपका मानना है दर्शन बौद्धिक स्तर पर उद्भूत होते हैं जबकि प्रायः कविता भावों के आग्रव से जन्म लेती है। आपकी कविता में जीवन दृष्टि या जीवन के प्रति दृष्टि बोध मिलता है। किसी विशेष दर्शन से आपकी कविता प्रभावित होती नहीं दिखती।
डॉ. शंभु नाथ एक विज्ञ समीक्षक-आलोचक हैं। समीक्षा या समालोचना के लिए व्यक्ति की निष्पक्ष दृष्टि, भावुकता एवं संवेदनशील हृदय, विश्लेषण की क्षमता, नीर-क्षीर विवेक, सच्चाई, ईमानदारी, धीरता, समीक्षता और स्थिरता को आवश्यक मानते हैं। समीक्षा के लिए उन्होंने तीन विराट कवियों साहित्यकारों को चुना- तुलसी, बच्चन और दिनकर। इन तीनों कवियों की विशेषता ने उन्हें प्रभावित किया विशेषकर तुलसी का वैयक्तिक संघर्ष तथा अवधी को जनभाषा के रूप में अपनाकर राम को जननायक के रूप में प्रस्तुत करना विलक्षण लगा। दिनकर ने स्वाधीनता संग्राम को प्रेरित करने वाली अनेक कविताएँ लिखीं और छायावादी कुहासे के आगे जनभाषा को अपनाकर रचना की। राष्ट्रीयता एवं रूमानियत के बीच जो काव्य उभरा है वह उन्हें बहुत लुभावना लगा। इसी प्रकार बच्चन ने उमर खैय्याम की भाव धारा को अपनाकर मधुशाला की रचना की। उनके शब्द अत्यन्त सरल एवं जनजीवन के हैं। फारसी बेलबूटी से संवरी भाव धारा तो आगे छूट जाती है पर बच्चन जन-जीवन की कविताएँ जन भाषा में करते रहे जो डॉ॰ शंभु नाथ को आकृष्ट करता है।
एक साहित्यकार के निर्माण में पूर्ववर्ती साहित्यकारों की प्रेरणा भी विशेष भूमिका अदा करती है। शंभुनाथ जी का मानना रहा है उन पर कवियों का नहीं कविताओं का और विचारकों का नहीं विचारों का प्रभाव पड़ा। संस्कृत में कालिदास, माघ, दण्डी, भवभूति आदि के साहित्य का तथा हिन्दी युग तक के अनेक विद्वानों एवं कवियों की कविताओं को उन्होंने पढ़ा। जिनमें तुलसी, कबीर, घनानन्द, सभी छायावादी कवि, अज्ञेय की कविताओं ने उन्हें विशेष रूप से प्रभावित किया। बांग्ला साहित्य के प्रति भी उनका झुकाव रहा जिसमें रवीन्द्रनाथ टैगोर की कविताओं ने उन्हें विशेष रूप से आकर्षित किया। अंग्रेजी साहित्य के आप अध्येता रहे। अंग्रेजी कवियों में चाउमर, स्पेन्सर, इलियट, पाउण्ड जैसे विचारकों ने उन्हें विशेष रूप से प्रभावित किया। प्रतिकूल समालोचना के सम्बन्ध में एक साक्षात्कार के मध्य डॉ॰ शंभु नाथ अत्यन्त दृढ़ता से कहते हैं-
“प्रशंसा का अपना एक आस्वाद होता है लेकिन मुझे अतिरंजित प्रशंसा अच्छी नहीं लगती है। यही बात समालोचना के साथ भी है। यदि समालोचना औचित्यपूर्ण, सकारण व सकारात्मक है तो मुझे अच्छी लगती है। प्रतिकूलता से मैंने निरन्तर ही सीखा है। प्रतिकूल परिस्थितियों में मैंने निरन्तर अपने आपको ऊर्जावान पाया है।”
जब कभी श्रेष्ठ साहित्यकारों ने डॉ॰ शंभु नाथ की कृतियों को सराहा, तब-तब उन्हें आगे और आगे बढ़ने-लिखने की प्रेरणा मिली। इससे उनका उत्साह भी दोगुना हुआ। जीवन में अनायास आये अवसाद के क्षणों को भी डॉ॰ शंभु नाथ ने अपनी रचनाधर्मिता के कारण एक भाव से ग्रहण किया। ऐसे समय में अनेक हिन्दी, अंग्रेजी कवियों कविताओं की पंक्तियां उनके मानव मन में उमड़ने लगती हैं और साहस एवं आशा की किरणें बिखर जाती हैं। यही स्थिति उनके अन्तिम भाषण में भी देखने को मिली जब वे श्रीमती मनोरमा श्रीवास्तव की पुस्तक ‘व्यथा कौन्तेय की’ के लोकार्पण समारोह में बोल रहे थे। दिनकर की पंक्तियों उद्धृत करते-करते वे ब्रह्मलीन हो गये। उनके अन्तिम शब्द भी लड़खड़ाये नहीं। शान्ति के साथ उन्होंने अन्तिम सांस ली।
एक कुशल प्रशासक साहित्यकार डॉ॰ शंभु नाथ प्रशासन के दुरुह दायित्वों और साहित्यकार के सहृदय व्यक्तित्व के विकास के द्वन्द्व को सुंदर शब्दों में अभिव्यक्त करते हैं-
‘बाह्य दृष्टि से देखने पर ऐसा प्रतीत होता है कि रचनाशीलता में हृदय रहता है और प्रशासनिक कार्यों में मस्तिष्क प्रधान रहता है। सृजन में संवेदनशीलता की प्रधानता होती है वही प्रशासनिक कार्य शुष्क एवं कठिन होते हैं। एक विडम्बनात्मक स्थिति यह भी उत्पन्न हो जाती है कि जब प्रशासनिक जगत में कवि या साहित्यकार और साहित्य जगत में प्रशासनिक अधिकारी के रूप में स्वीकार किये जाने का जोखिम बढ़ जाता है। मैं यह मानता हूँ कि सृजनशीलता स्वयमेव एक ऐसा गुण या संस्कार है जो जीवन के कठिनतम एवं गूढ़तम स्थितियों को देखने-परखने अथवा गढ़ने में सहायक सिद्ध होता है। इस संदर्भ में जटिल प्रशासनिक स्थितियों में भी सृजनशील होने का अपना महत्त्व है।’
डॉ. शंभु नाथ के भाषणों की एक अन्य विशेषता कोई कहानी होती है। यह कहानी हमारे आपके बीच की भी हो सकती है, लोक जीवन से जुड़ी हुई भी हो सकती है, किसी अन्य संदर्भ में रेखांकित करने वाली कथा भी हो सकती है, लेकिन उस कहानी में जीवन का ऐसा सत्य होता है जिसमें से प्रेरणा मिलती है और उनकी जादुई अभिव्यक्ति हमें लंबे समय तक याद रहती है।
कुछ ऐसी ही स्थिति शनिवार, 30 अगस्त, 2025 को सायं 6.00 बजे के आसपास भी उपस्थित हुई। डॉ॰ शंभु नाथ जी एक राजा की कहानी सुना रहे थे जिसे स्वप्न में काल दिखायी देता है और कहता है तुम्हे कल लेने आऊँगा। वह अपने सलाहकारों से स्वप्न का अर्थ पूछता है एक सलाह को मानकर वह वेगवान घोड़े पर बैठकर काल से बचने के लिए बहुत दूर चला जाता है। घोड़ा थककर खड़ा हो जाता है, राजा भी घोड़े से उतर कर विश्राम करना चाहता है तो पाता है सामने एक व्यक्ति खड़ा है, जिसकी शक्ल स्वप्न में देखे काल से मिलती है। काल अट्टहास करता है और कहता है- तुम्हारी मृत्यु तो यहां निर्धारित थी। कल मैं सोच रहा था तुम यहां कैसे आओगे ? देखो तुम, स्वयं चलकर आ गये।
यही स्थिति डॉ. शंभु नाथ जी के साथ हुई अनेक बार मृत्यु को पराजित कर वे हम सबके बीच लौट आये। परन्तु काल से साक्षात्कार का दिन तिथि और समय तो पूर्व निर्धारित था वे काल से साक्षात्कार करते-करते शांति के साथ विदा हो गये किंकर्त्तव्यविमूढ़ से हम उन्हें देखते ही रह गये। आत्मा परमात्मा में विलीन हो गयी। शरीर पंचतत्त्व का बना है, पंचतत्त्व में समा गया।
डॉ. शंभु नाथ को विनम्र श्रद्धांजलि। आपका स्थान अक्षुण्य था, अक्षुण्य है, अक्षुण्य रहेगा।
(लेखिका उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान में प्रधान संपादक के पद पर कार्यरत हैं। उन्होंने डॉ. शंभु नाथ के जीवन पर एक पुस्तक भी लिखी है।)
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