संस्था जैसे व्यक्तित्व का प्रभावी चित्रण

संपादक-वीरेंद्र कुमार सिंह
वाराणसी के ईश्वरगंगी मुहल्ले में 26 अक्टूबर, 1924 को ठाकुर प्रसाद सिंह का जन्म हुआ था। एक साधारण परिवार में जन्में करिश्माई व्यक्तित्व के मालिक ठाकुर प्रसाद सिंह का वर्ष 1994 के अक्टूबर माह में बीमारी से जूझते हुए निधन हो गया था।ठाकुर प्रसाद सिंह ने हिन्दी तथा प्राचीन भारतीय इतिहास व पुरातत्व में उच्च शिक्षा प्राप्त की थी। कई वर्षों तक अध्यापन और पत्रकारिता के बाद ठाकुर प्रसाद सिंह उत्तर प्रदेश के सूचना विभाग में निदेशक के पद को शोभामान करने बाले कालांतर में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के निदेशक भी रहे।
पत्रकार, साहित्यकार, कवि, ठाकुर प्रसाद सिंह की जन्मशती पर वीरेन्द्र कुमार सिंह के संपादन में अप्रतिम वार्षिक पत्रिका का प्रकाशित अंक ठाकुर प्रसाद सिंह के जीवन के अनछुए प्रेरणादायक प्रसंगों तथा उनकी लेखनी से परिचित कराता है। अप्रतिम का यह अंक छै रूपाकार में विभाजित किया गया है। आलेख शीर्षक में पांच आलेख हैं। पेज नंबर 28 पर प्रकाशित विष्णुचन्द्र शर्मा लिखते है-ठाकुर प्रसाद सिंह का पत्रकार और कवि निरंतर इस सड़ांध को देख रहा था। 20/ 12 /50 की खत में उन्होंने लिखा था मेरी अपनी एक देखने की आंख है जो स्वयं अपने को भी बड़ी निर्ममता से देखती है।”
संपादकीय में वीरेंद्र कुमार सिंह स्वयं लिखते हैं ठाकुर प्रसाद सिंह किसी संगठन या खास विचारधारा के साथ नाभिनालबद्ध नहीं रहे। बड़ी हैसियत और रसूख के बावजूद उन्होंने कोई बड़ा प्रकाशक घराना भी नहीं पाला। उपकृत उन्होंने अवश्य बड़ी संख्या में लोगों को किया लेकिन वह सब जरूरतमंद गरीब गुरबा लोग थे जिनके पास देने के नाम पर सिर्फ दुआएं होती हैं । ऐसे में यदि ठाकुर प्रसाद सिंह की जन्मशती पर सन्नाटा है तो उसे इसी परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए। संपादकीय चिंता जायज है। इन पंक्तियों के लेखक को ठाकुर प्रसाद सिंह से मुलाकात करने का अवसर अपने गृह जनपद के साधारण कवि की पुस्तक स्वयं छपाने और विमोचन में आने से मिला था।
ठाकुर प्रसाद सिंह ने साहित्य आन्दोलन को सक्रिय करने के लिए 1940 के आसपास आपने मोहल्ले ईश्वरगंगी में साहित्यिक संघ जैसी संस्था का स्थापना कर दी और देखते-देखते यह बनारस की अग्रणी संस्थानों में गिनी जाने लगी। निश्चित रूप से यह बात कहने में कोई संकोच नहीं है कि प्रतिकूलताओं में भी अनूकलता के साथ काशी में साहित्यिक ध्वज वाहकों के बीच अपनी प्रतिभा से अपनी उपादेयता स्थापित की। ग्राम्या (साप्ताहिक) और उत्तर प्रदेश (मासिक) पत्र-पत्रिका के संपादन में योगदान दिया।
उन्होंने गीतों व कविताओं के अलावा कहानी, निबंध और उपन्यास विधा में भी योगदान किया है। ‘महामानव’ (प्रबंध-काव्य), ‘वंशी और मादल’ (गीत-संग्रह) और ‘हारी हुई लड़ाई लड़ते हुए’ उनकी चर्चित काव्य-कृतियाँ हैं। ‘चौथी पीढ़ी’ उनकी कहानियों का संकलन है और ‘कुब्जा सुंदरी’ और ‘सात घरों का गाँव’ उनके उपन्यास हैं। ‘पुराने घर नए लोग’ और ‘प्रदक्षिणा’ उनके निबंध-संग्रह हैं। इसके अतिरिक्त उन्होंने ‘पहिए’, ‘कठपुतली’, ‘गहरे सागर के मोती’, ‘हिंदी निबंध और निबंधकार’ आदि कृतियों की रचना की है। ‘मोर पंख’ में उनकी प्रतिनिधि गद्य रचनाओं का संकलन हुआ है।
समकालीन साहित्यकार प्रभाकर माचवे 5.5.47 को उज्जैन से ठाकुर प्रसाद सिंह के नाम एक पत्र लिखते है।पत्र के भावों से व्यक्त्तिव की झलक समझ सकते है।-प्रियवर,
आपका ‘महामानव’ मिला था । और बहुत अच्छा लगा भी था। उस पर मैंने बड़ी सी आलोचना ‘कर्मवीर’ में प्रकाशनार्थ कभी की भेज दी है। पता नहीं, अभी तक क्यों नहीं छपी? शायद एक दो सप्ताह में निकल जाय। हिंदी में गाँधीजी पर लिखी हुई अन्य पुस्तकों में सियाराम जी की ‘बापू’ के बाद मैं ‘महामानव’ को सर्वश्रेष्ठ मानता हूँ। उसमें प्रगतिशील काव्य-शैली है और भावों की उड़ान भी काफी ऊँची और पैनी है। केवल छपाई मुझे पसंद नहीं आई। भाई शिवनाथ की ‘हंस’ में छपी लेखमाला पर मैं एक प्रत्यालोचना लिख रहा हूँ। त्रिलोचन अब कहाँ गये? ‘हंस’ पर उनका नाम नहीं दिखा। उनकी ‘धरती’ और अज्ञेय ‘इत्यलम’ की प्रतियाँ भिजवा सकेंगे? कृपा बनाये रखेंसस्नेह। प्रभाकर माचवे
नोबल पुरस्कार विजेता प्रसिद्ध रूसी लेखक बोरिस पास्तरनाक की चिड़ियाघर पर लिखी गई कविता और ठाकुर प्रसाद सिंह की चर्चित कविता ‘चिड़ियाघर’ का तुलनात्मक अध्ययन अजय कुमार द्वारा अपने विशिष्ट अंदाज में किया गया है।
चिड़ियाघर तो बहुतेरे हैं। दुनिया में भी और कविता में भी। यहाँ जिन दो का जिक्र है वे कविता में हैं। एक रूसी कवि बोरिस पास्तरनाक और दूसरा हिन्दी कवि ठाकुर प्रसाद सिंह की कविता में। बोरिस पास्तरनाक की चिड़ियाघर 1929 में लिखी गई है। ठाकुर की 1986 में प्रकाशित उनके कविता संकलन ‘हारी हुई लड़ाई लड़ते हुए’ में संग्रहीत है। ‘वंशी और मादल’ ठाकुर प्रसाद सिंह की रचनात्मकता का सर्वोच्च शिखर है। वर्ष 1959 में प्रकाशित यह काव्यकृति कालजयी है और इससे उन्हें अपार यश मिला। संथाली गीतों के ताप में ताये हुए ‘वंशी और मादल’ के गीत हिन्दी की अमूल्य निधि है जिनमें आदिवासी जीवन की धड़कन साफ सुनी जा सकती है।
नदिया का घना घना कूल है
ने पूर्व पद कर ‘अनुदान – होने के बाद कुर जी एक
वंशी से बेंधो मत प्यारे
लेते रहे। चाह
यह मन तो बिंधा हुआ फूल है
ज हो वे सदैव
नदिया का घना घना कूल है
ठाकुर प्रसाद सिंह के जीवन तवज्जो देते हुए उनके जीवन चरित को अप्रतिम वार्षिक पत्रिका के 6 अध्यायों में समेटने की कोशिश की है। छात्रों, अध्यापकों और शोधकर्ताओं के लिए अत्यंत उपयोगी व प्रामाणिक सामग्री जुटाने हेतु संपादक वीरेन्द्र कुमार सिंह जो अनथक श्रम किया है, वह मुग्धकारी है।
समीक्षक-सुरेन्द्र अग्निहोत्री




