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गण गौण, तंत्र हावी

0 पवन कुमार पाण्डेय

गण गौण 

तंत्र हावी

कल जैसे ही बोला 

राजा साहब ने तिरछी नज़र से देखा 

बैठ गए करोडीया रथ में 

बुदबुदाते हुए हाथ हिलाते हुए 

बंद मुट्ठी के साथ अलगू

टकटकी लगाये देखे जा रहा था

साहब बस मुझे भी देख ले

तो

फिर कुछ बाकी नहीं रहेगा 

मेरे जीवन में

तभी लगा

शायद अब पाँच साल तक अलगू अप्रासंगिक है 

न उसका मत है

ना मानव 

ना मानवाधिकार

झरते आसमान 

सर्द हवाओं में 

ठिठुरता अलगू

अपने को अकेला पाता है 

जैसे गण सांकेतिक हो

और धरा बस तंत्र ।

(फोटो-प्रतीकात्मक। साभार सोशल मीडिया)

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