विशेष

ग़ज़ल- मंजिल की तलाश में

कोई दरवेश लिए फिरता है जहां में कासा!

कोई पगली है मुफ़लिसी को समझती ही नहीं।

 

कोई तो तेग़ चलाता है अपनी बातों से!

किसी की डर से ज़बां चलती ही नहीं।

 

कोई है जिसपे बैठती हैं तितलियां आकर !

किसी कमज़र्फ से बेटियां ही पलती नहीं।

 

कोई है जिसके घर करता है नौकरी सूरज!

किसी के घर जुगनू की लौ भी जलती ही नहीं ।

 

कोई है जिसको चलते ही होती है मयस्सर!

किसी को उम्र भर मंजिल कोई मिलती ही नहीं ।

अभिषेक बचन यादव ‘बच्चन’

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