एचआईवी का इलाज अब मुमकिन, लेकिन सस्ती और स्थायी व्यवस्था आज भी बड़ी चुनौती

Lucknow Focus News Desk: एचआईवी (HIV) जैसी घातक बीमारी के इलाज और रोकथाम में बीते तीन दशकों में विज्ञान ने काफी तरक्की की है। आज के दौर में यह वायरस अब लाइलाज नहीं रहा। आधुनिक एंटीरेट्रोवायरल दवाओं (ART) की मदद से एचआईवी संक्रमित व्यक्ति भी लगभग सामान्य जीवन जी सकता है। यही नहीं, ये दवाएं वायरस के फैलाव को रोकने में भी बेहद कारगर हैं।
समय पर इलाज से थम सकती है एचआईवी की रफ्तार
विशेषज्ञों की मानें तो अगर एचआईवी संक्रमित व्यक्ति समय पर और नियमित रूप से दवाएं ले, तो उसकी उम्र औसत व्यक्ति के बराबर हो सकती है। इसके अलावा, ये दवाएं वायरस को दूसरों तक पहुंचने से भी रोकती हैं। हालांकि, अब तक एचआईवी का कोई प्रभावी टीका विकसित नहीं हो सका है।
संक्रमण से बचाव के लिए नई दवाएं उपलब्ध
उच्च जोखिम वाले लोगों के लिए प्रि-एक्सपोज़र प्रोफिलैक्सिस (PrEP) नाम की दवाएं उपलब्ध हैं, जिन्हें रोज़ाना या जरूरत के अनुसार लिया जा सकता है। हाल ही में अमेरिका में छह महीने तक सुरक्षा देने वाला एक इंजेक्शन भी मंजूरी पा चुका है, जो संक्रमण से बचाव में मददगार साबित हो सकता है।
तो फिर इलाज की खोज क्यों है जरूरी?
हालांकि मौजूद दवाएं कारगर हैं, लेकिन उनकी सफलता लगातार और निर्बाध आपूर्ति पर निर्भर करती है। कई विकासशील देशों में स्वास्थ्य सेवाओं की सीमाएं, दवाओं की ऊंची कीमत और राजनीतिक अस्थिरता जैसे कारणों से यह आपूर्ति प्रभावित होती है।
उदाहरण के तौर पर, अमेरिका की ओर से अपनी विदेशी सहायता (USAID) में की गई कटौती ने कई निम्न-आय वाले देशों में एचआईवी दवाओं की उपलब्धता पर संकट खड़ा कर दिया है। वहीं, PrEP इंजेक्शन की महंगी कीमत इसे उन देशों तक पहुंचने से रोकती है जहां एचआईवी का भार सबसे ज्यादा है।
कम कीमत में भी बन सकता है इंजेक्शन
कुछ शोधकर्ताओं का दावा है कि इन इंजेक्शनों को कम लागत में भी तैयार किया जा सकता है। लेकिन असल मुद्दा यह है कि क्या ये दवाएं उन लोगों तक पहुंच पाएंगी जिन्हें उनकी सबसे ज़्यादा जरूरत है?
क्या कोई मरीज एचआईवी से पूरी तरह ठीक हुआ है?
अब तक सात से अधिक ऐसे मामले सामने आए हैं जिनमें मरीजों के शरीर से एचआईवी का नामोनिशान तक नहीं मिला। लेकिन इनमें सभी को कैंसर था और उन्हें बोन मैरो ट्रांसप्लांट किया गया था—वो भी ऐसे डोनर से जिनके शरीर में एचआईवी रिसेप्टर नहीं थे।
हालांकि, यह प्रक्रिया बेहद महंगी, जोखिम भरी और आम लोगों के लिए व्यावहारिक नहीं है। इसलिए वैज्ञानिक अब नई और आसान इलाज विधियों की तलाश में जुटे हैं।
एमआरएनए आधारित नई उम्मीद
हाल ही में ऑस्ट्रेलिया में वैज्ञानिकों ने एक नैनोपार्टिकल आधारित एमआरएनए तकनीक विकसित की है, जो शरीर में छिपे एचआईवी वायरस को उजागर करती है ताकि दवाएं या इम्यून सिस्टम उसे खत्म कर सके। हालांकि यह अब तक सिर्फ प्रयोगशाला स्तर पर सफल रही है और इंसानों पर इसका परीक्षण बाकी है।
क्या है आगे का रास्ता?
विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक कोई सस्ता, प्रभावी और व्यावहारिक इलाज विकसित नहीं हो जाता, तब तक हमें मौजूदा दवाओं, जागरूकता और रोकथाम की रणनीतियों पर भरोसा करना होगा।
इसके लिए यह जरूरी है कि हर व्यक्ति को समय पर जांच, पीआरईपी और दवाओं तक बराबरी से पहुंच मिल सके। तभी हम एचआईवी से जुड़े सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी संकट पर प्रभावी नियंत्रण पा सकते हैं।
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