विशेष

होली, फगुआ, रंगोत्सव

 

गोरिया करके सिंगार, अंगना में पिसेलीऽ हरदिया …

रंगरसिया रंगबाज ……. जोगीरा सारारारारा ……

होली, फगुआ, रंगोत्सव ..

लेकिन मेरे लिए तो बस फगुआ …. वाह खिलाड़ी वाह……

राग है ताल है लय है बस नहीं है तो वो दुआर ( चौपाल) …. जहाँ शिवरात्रि से शुरू होता था

…… पूजी ला श्रीभगवान हेरामा पूजी ला श्रीभगवान ……

 

नहीं है तो वो मस्ती जो स्नेह सम्मान अपनापन से बंधी होती थी।

नहीं है तो हुलड़पन जिसका इंतजार पूरे साल रहता था।

फगुआ सुनने का इंतजार रहता था भाभीओं को भी…..

उनकी भी मन की बात फगुआ गाकर रखना हम धर्म समझते थे …

आखिया भईले लाल

आखिया भईले लाल

एक नींद सुते द बलमुआ।

बस वो ठिठोली गायब है,

गायब है वो पुआ जो प्रेम के रस से बना होता था।

हम लोग एक फगुआ गाते थे…

एक ओरी सुतेल न लालू प्रसाद,

दूसरऽ ओरी सुते रमईराम

पटना सचिवालय में …

लेकिन पता नहीं वो फगुआ कहा गया, आज सब एक बस यादों में जगह बना ली।

होली की हुडदंग कहाँ चला गया कहाँ गया वो अपनापन ,  कहाँ गया वो रंग।

सुना है रंगों की भाषा होती है लेकिन मुझे नहीं मालूम।

लेकिन मालूम है एक रंग जो हमेशा चढ़ा होना चाहिए

क्योंकि उसकी एक अपनी खुश्बू होती,

एक पकड होती है एक अपनत्व की भाषा होती बिना किसी लागलपेट केव।

बस आज फिर गा रहा है दिल …

बिहार में सुशासन देखा

दिल्ली में विकास

ममता दीदी कह रही हैं

ना किसी का चांस

जोगीरा सारा  रारारा

केहू फेंके बम गोला

केहू फेंके मिसाइल

चौकीदार खाली मुँह से फेंका

सब कहा गये हेराई

जोगीरा सारा रारारा———

-पवन कुमार पाण्डेय

 

Related Articles

Back to top button