विशेष

आया हूँ जो लौट कर !

उद्धव के ज्ञान का ग़ुबार,

योग का चमकता इश्तिहार,

गोपियों को नहीं सका उबार,

प्रेम की अथाह गहराइयों से,

अंततः ! प्रेम बड़ा था,

निर्गुण की परछाइयों से,

कान्हा की बाँसुरी के तानों में ,

गूँजता रहा, राधा के पायल का संगीत,

राधा-किशन जीते रहे, प्रेम कालातीत,

दृश्य बदलने के लोभ में,

मैं भी जाने किस क्षोभ में,

निकला तो घर से बाहर,

समझकर ख़ुद को बुद्ध,

लड़ता रहा ख़ुद से युद्ध,

सहस्त्राब्दियाँ गुज़र चुकीं, अब तक,

चातक था, लौटा हूँ बनकर याचक,

हवायें भी करती चलती हैं सरगोशी,

शर्मिंदा ए वफ़ा!  मैं हूँ तुम्हारा दोषी,

पर अब मेरे लौटने पर,

देख जो लेतीं, मुझे पल भर,

मिट जाता मुझसे मेरा ही डर,

भिक्षाटन नहीं मात्र !

मेरा भीगा मन भी देखतीं यशोधरा,

अपने अपात्र का पात्र,

अपने आँसुओं से भरतीं तो ज़रा,

ख़ाली अंजुरी से न करती ईशारा,

फिसली रेत, फिसली है जलधारा,

पर तुम्हारी आँखें न बरसती हैं, न करती हैं  तिरस्कार कोई,

तुम पर सच में नहीं रहा क्या तुम्हारे बुद्ध का ,

अधिकार कोई ? ….

‘नैय्यर उमर अंसारी’

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