तनी रुका… बताता हूं, पहले चने खा लूं

इस समय राजधानी के राजनीतिक हलकों में प्रदेश में पूर्व में सत्तारूढ़ रही एक पार्टी की अगले महीने होने वाली रैली की खूब चर्चा हो रही है। कहा जा रहा है कि इस रैली के बाद प्रदेश का राजनीतिक समीकरण बदल जाएगा। क्योंकि यह पार्टी, जो अभी सत्ता की दौड़ में काफी पीछे मानी जा रही है, इस रैली के बाद काफी आगे निकल जाएगी। इसी तरह की कई बातें हवा में तैर रही हैं। एक घिसा-पिटा मुहावरा भी यहां ठोंक सकते हैं- जितने मुंह उतनी बात। दारुलशफा बिल्डिंग के बाहर लगे एक चने के ठेले के पास चार पार्टी कार्यकर्ता खड़े होकर चने खाते हुए इसी मुद्दे पर चर्चारत थे। एक मोटे कार्यकर्ता ने दूसरे से पूछा-तुम्हारे जिले से कितनी बसें आ रही हैं ? उसने जवाब दिया-पच्चीस। फिर उसने चने के साथ मिले हुए मिर्ची के टुकड़ों को अलग करते हुए दूसरे से पूछा-तुम्हारे यहां से कितनी बसें आएंगी ? उसने कहा-तीस। फिर तीसरे से पूछा तो उसने कोई जवाब नहीं दिया। दूसरी बार पूछने पर वह बोला-मैं बसों की गिनती नहीं करता। मैं तो यह जानता हूं कि रैली वाले पार्क को बस भर देना है। इस तरह भर देना है कि तिल रखने की जगह न मिले। इस पर उसने पूछा तो क्या तुम अकेले भर दोगे पार्क को? हांकने के बजाय यह बताओ कि कितनी बसें आ रही हैं तुम्हारे जनपद से? उसने कहा-तनी रुका…। पहले चने खा लूं, फिर संख्या बताता हूं।
अध्यक्ष न हुए, आकाश-कुसुम हो गए
पार्टी कार्यालय के एक कमरे में कई नेतागण चर्चा में मशगूल थे। एअरकंडीशंड की ठंडी हवा के बावजूद माथे से पसीना पोछते हुए एक पूर्व एमएलसी नेताजी दूसरे से बोले-पता नहीं वह दिन कौन-सा दिन होगा, जब अपना यहां नया अध्यक्ष आफिस को सुशोभित करेगा ? इस बारे में आपको कोई जानकारी हो तो बताइए। दूसरे नेताजी ने कहा-अब इतना तो तय ही है कि पहले दिल्ली में अध्यक्ष आ जाएगा, तभी लखनऊ की बारी आएगी। इस पर पूर्व एमएलसी बोले-अपना नया अध्यक्ष तो जैसे आकाश-कुसुम हो गया। पार्टी हाईकमान को जिसको भी बनाना हो, चटपट बनाकर छुट्टी करे। जितनी देरी करेंगे, उतना ही संगठन को नुकसान होगा। पुराने अध्यक्ष जी काम कर तो रहे हैं लेकिन वह भी बहुत मन से काम नहीं कर रहे हैं। कुल मिलाकर इस समय बड़ी कन्फ्यूजन की स्थिति है। इसके बाद पूर्व एमएलसी नेताजी ने तीसरे नेताजी, जिन्होंने ब्लू कलर की सदरी पहन रखी थी, से पूछा-आप बताइए, इस बारे में कुछ…। आपके पास कोई सूचना है क्या ? इस पर ब्लू कलर की सदरी पहने हुए नेताजी झल्लाकर बोले-ऐसा है भाई, मैंने अब इस विषय पर चर्चा करनी एकदम बंद कर दी है। इसलिए कृपया मुझे इस चर्चा में शामिल करने से बख्शे रहें।
इतनी औकात होती तो आज यहां न होता…
सबसे पुरानी पार्टी के मुख्यालय के बाहर चाय की दुकान पर मजमा जमा था। 15 से अधिक कार्यकर्ता थे और एक महापुरुष को श्रद्धांजलि देकर उस कार्यक्रम से जस्ट लौटे थे। चाय वाले से एक ने कहा-कड़ी चाय बनाओ, सभी को पिलाओ। फिर कुछ याद आया, तो बोला-दादा की चाय बिना चीनी वाली रहेगी। इस पर चाय वाला बोला-हमें न बताइए, हमें मालूम है। इसके साथ ही उनसे अपनी मुस्कान की लंबाई बढ़ाते हुए इमामदस्ते में अदरक कूटने की रफ्तार बढ़ा दी। बतकही शुरू हुई तो वही दादा, जो बिना चीनी की चाय लेते थे, बोले-मुझे तो लगता है कि जब तक प्रदेश में दीदी आकर खुद नहीं कमान संभालेंगी, यहां कुछ नहीं होने वाला। इस पर दो कार्यकर्ता लगभग एक साथ बोल उठे-मैं तो बहुत पहले से यह कह रहा हूं। फिर दोनों संयुक्त स्वर में ही बोले-तो आप करिए ऊपर बात। यह हम सभी की भावना है। इसी के साथ उसने सभी कार्यकर्ताओं की तरफ हाथ से इशारा किया। इस पर दादा बोले-मेरी इतनी औकात कहां? इतनी औकात होती तो आज यहां न होता…। इसी के साथ दादा बड़े पैन में उबल रही चाय को देखने लगे।
भगवान उन्हें वे दिन फिर न दिखाएं
सचिवालय के मुख्य भवन स्थित एक प्रमुख सचिव के आफिस में दो जूनियर अफसर बैठे बातें कर रहे थे। प्रमुख सचिव महोदय किसी मीटिंग में गए थे। एक जूनियर अफसर बोला-साहब से जब भी मिलने आता हूं, उन्हें अचानक मीटिंग में जाना पड़ जाता है, बात ही नहीं हो पाती। समझ में नहीं आता कि क्या करूं ? वह घर पर भी बहुत कम रहते हैं, नहीं तो मैडम से सोर्स लगाकर घर पर ही जाकर मिल लेता। इस पर दूसरा अफसर बोला-लेकिन शुक्र मनाइए कि साहब इतने व्यस्त रहते हैं। यह व्यस्तता वाली कुर्सी पाने के लिए उन्होंने कितने पापड़ बेले हैं, यह तो आप भी जानते हैं। साहब व्यस्त रहें, इसी में हम दोनों की भी भलाई है। आप जानते ही हैं-उनका एक लंबा वक्त आफिस में बैठकर मक्खियां मारते हुए बीता है। भगवान उन्हें वे दिन फिर न दिखाएं।
घटोत्कच




