मोतीलाल वोरा की याद में उदास है लखनऊ का राजभवन


DECEMBER 21, 2020
एक सक्रिय और समर्पित संकटमोचक थे इसलिए मरते दम तक सक्रिय रहे
लखनऊ फोकस ब्यूरो
लखनऊ। वरिष्ठ कांग्रेस नेता, पूर्व केंद्र मंत्री, मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और उत्तर प्रदेश के पूर्व राज्यपाल मोतीलाल वोरा के निधन से लखनऊ में शोक की लहर दौड़ गई। श्री वोरा एक प्रखर राजनेता, समर्पित समाजसेवक और पार्टी हाईकमान के प्रति बेहद समर्पित राजनीतिक कार्यकर्ता थे। आज लखनऊ का राजभवन बेहद उदास नजर आया।
उत्तर प्रदेश का राजभवन श्री वोरा की सक्रियता के लिए याद किया जाएगा। श्री वोरा 26 मई, 1993 से तीन मई, 1996 तक उत्तर प्रदेश के राज्यपाल रहे। इस कार्यकाल के दौरान प्रदेश में राष्ट्रपति शासन भी रहा। उस समय उन्होंने प्रदेश की प्रशासनिक बागडोर भी संभाली। प्रदेश में राष्ट्रपति शासन के दौरान श्री वोरा ने ऐसा काम किया कि प्रदेश की जनता को नहीं लगा कि राज्य में एक चुनी हुई सरकार नहीं है।

स्व. मोतीलाल वोरा (फाइल फोटो)
श्री वोरा आज भी जब कभी लखनऊ आते थे तो उनसे मिलने के लिए पुराने लोगों का तांता लग जाता था। वह एक सक्रिय राजनेता के साथ पार्टी हाईकमान के प्रति बहुत ही समर्पित थे। यही कारण था कि वह मरने के अंतिम दिनों तक कांग्रेस आलाकमान और उसकी मुखिया के प्रिय रहे। आज भले ही वह अध्यक्ष के खास लोगों के रूप में गिने जाते थे लेकिन उनकी मह्ता हमेशा हाईकमान की नजर में रही। यह स्थिति कई दशकों तक रही।
1982 का एक वाकया याद करते हुए वरिष्ठ कला समीक्षक और पेंटर श्री अखिलेश निगम कहते हैं कि मैं लखनऊ आर्ट्स कालेज ज्वाइन करने के पहले कुछ समय तक नेशनल हेराल्ड ग्रुप के साथ भी रहा था। श्री मोतीलाल वोरा ग्रुप के डायरेक्टर थे। 1982 में हेराल्ड कर्मियों ने कुछ मांगों को लेकर हड़ताल शुरू कर दी। बात न बनती देख कांग्रेस आलाकमान ने श्री वोरा को लखनऊ भेजा। उन्होंने आकर कर्मियों से बात की और उन लोगों ने अपनी हड़ताल खत्म कर दी। तभी मुझे श्री वोरा की प्रबंधन क्षमता और महत्ता का पता चला। श्री निगम कहते हैं कि अच्छी बात यह रही कि अपनी समर्पित संकटमोचक की यह क्षमता उन्होंने जीवन के आखिरी समय तक बनाए रखी। उनकी उपयोगिता अंत तक बनी रही। प्रभु उन्हें अपने श्रीचरणों में स्थान दें।
श्री अखिलेश निगम दूसरी बार उनसे 1994 में उनसे तब मिले जब वह प्रदेश के राज्यपाल थे। वह बताते हैं कि उनके समय में राजभवन के दरवाजे आम लोगों के लिए खुले थे। कोई भी उनसे मिल सकता था। उनके जैसा सहज राजनेता होना बड़ा मुश्किल है।
ध्यान से देखिए तो आज लखनऊ का राजभवन बेहद उदास लग रहा है। शायद उसे याद आ रही है अपने पूर्व मुखिया की। दिवंगत वोरा जी को सादर नमन!
(फोटो-राजभवन की वेबसाइट और सोशल मीडिया से साभार)



