ई-गवर्नेंस के दौर में भी खनन माफिया का जोर


किसी विभाग में एसटीएफ (स्पेशन टॉस्क फोर्स) को दखल देकर कार्रवाई करनी पड़े तो उस विभाग की प्रतिष्ठा को भारी ठेस पहुंचती है। फतेहपुर जिले के खान अधिकारी, कुछ विभागीय कर्मचारियों और परिवहन विभाग के अफसरों-कर्मियों के खिलाफ जिले के थरियांव थाने में एसटीएफ ने मुकदमा दर्ज करवाया है। इन सभी पर खनन माफिया से मिलीभगत करके बिना परमिट के खनिजों (बालू-मौरंग) से लदे ट्रकों को पार करवाने का आरोप है। फतेहपुर की यह घटना नई नहीं है। यह खेल कई जिलों में चल रहा है। उन जिलों में खास तौर पर चल रहा है, जो खनिज-संपन्न की कैटेगरी में आते हैं।
खान और परिवहन विभाग की मिलीभगत से इस अवैध खेल के कारण खान विभाग, जो सरकार के प्रमुख कमाऊ विभागों में से एक है, की प्रतिष्ठा पर समय-समय पर दाग लगता रहा है। ऐसे में जब प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टालरेंस की नीति लागू कर रखी है और जब विभाग ने अभी कुछ दिनों पहले ही एसएमआर इंडेक्स में खास जगह बनाई है, तो फतेहपुर की घटना विभाग के चेहरे पर एक बदनुमा दाग है।
पिछले दिनों चीन द्वारा भारत के साथ रेअर-अर्थ के निर्यात सौदे के लिए नई शर्तें थोपने के वैश्विक अनुमानों के बीच यह अच्छी खबर आई कि हमारे उत्तर प्रदेश ने स्टेट माइनिंग रेडीनेस इंडेक्स में (एसएमआरआई) दूसरा स्थान प्राप्त किया है। यह स्थान बी श्रेणी में है (दूसरे खनिज प्रधान प्रदेशों के मुकाबले उत्तर प्रदेश में खनन क्षेत्रफल कम होने के कारण इसे बी श्रेणी में रखा गया है)। इससे यह स्वयंसिद्ध है कि प्रदेश में खनिज सुधार प्रक्रिया को बेहतर और नवाचारी ढंग से अपनाया जा रहा है और खनन में प्रदेश की स्थिति बेहतरीन है।
इस समय प्रदेश के खनिज राजस्व में वृद्धि की दर साढ़े 18 प्रतिशत के आसपास है। एक आंकड़े के अनुसार मौजूदा वित्तीय वर्ष में मई महीने तक ही 623 करोड़ रुपये आमदनी हुई है, जिसके साल के अंत तक चार हजार करोड़ रुपये से अधिक होने का अनुमान है। पिछले वित्तीय वर्ष में कुल राजस्व की प्राप्ति 3,350 करोड़ रुपये से ज्यादा थी। अगर यह वृद्धि अनुमान के अनुसार चार हजार करोड़ रुपये पहुंचती है, तो यह वृद्धि दर लगभग 20 प्रतिशत होगी।
आज के लगभग तीन दशक पहले (1998 में) प्रदेश की तत्कालीन कल्याण सिंह सरकार ने राज्य के लिए खनिज नीति की घोषणा की थी (इसके पहले प्रदेश में खनिज के लिए कोई नीति नहीं बनी थी)। तब खनिज को प्रदेश में पहली बार उद्योग का दर्जा दिया गया था। उस समय भी इन पंक्तियों के लेखक ने यह बात लिखी थी कि इस विभाग में भ्रष्टाचार का प्रमुख कारण खनिज विभाग का परिवहन विभाग के साथ किया गया अपवित्र गठजोड़ है। दुखद है कि वह स्थिति आज इतने वर्षों के बाद भी बरकरार है। वह भी तब, जब आज हमारी टेक्नॉलोजी बहुत उन्नत हो चुकी है। इसके साथ ही साथ खान विभाग में ई-गवर्नेंस को लागू किया गया है।
आज की तारीख में, जब खनिज परिवहन के लिए जीपीएस लगे वाहनों का इस्तेमाल किया जा रहा है, परमिट की डिजिटल मॉनीटरिंग की जा रही है, खान विभाग के लोग परिवहन विभाग के साथ मिलकर बहुत से ऐसे वाहन निकाल देते हैं, जिनका खनिज के रवाना होने का रवन्ना नहीं बना होता। रवन्ना अर्थात परमिट (ई-एम-एम-11), जिसे अब ऐप के जरिये भी ट्रैस किया जा सकता है। इसमें खान विभाग के साथ आरटीओ के कर्मचारी भी मिले होते हैं। इस मामले में कई गंभीर अपराध सामने आ चुके हैं।
खान विभाग की मौजूदा सेक्रेटरी और डायरेक्टर माला श्रीवास्तव ने खुद कई बार छापे मारकर ऐसी कार्रवाई की है (ऐसा बहुत कम होता है कि डाइरेक्टर स्तर पर छापे डाले जाएं) लेकिन खनन और परिवहन विभाग के गठजोड़ के चलते चल रहा यह भ्रष्टाचार न केवल विभाग की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचा रहा है बल्कि इससे राज्य सरकार को राजस्व की भी भारी क्षति हो रही है। माला श्रीवास्तव से पहले की डायरेक्टर डॉ. रोशन जैकब भी माला श्रीवास्तव की ही तरह सख्त और सजग थीं। इन दो महिला अफसरों के अथक प्रयासों के बाद विभाग की सेहत और सूरत काफी हद तक सुधरी है लेकिन फतेहपुर जैसी घटनाएं सारे किये-कराये पर पानी फेर दे रही हैं।
भूतत्व एवं खनिकर्म निदेशालय को सरकारी राजस्व को चूना लगाने की ऐसी ढेरों शिकायतें प्राप्त होती हैं, इन्हें रोकने का प्रयास भी किया जाता है लेकिन शिकायतें कम नहीं हो रही हैं। यह स्थिति तब है जब खनिज विभाग में ई-गवर्नेंस बढ़ने के बाद द्रोन एवं अन्य टेक्नालॉजी के प्रयोग के कारण विभागीय कार्यों में काफी हद तक पारदर्शिता आई है।
खान विभाग से प्राप्त जानकारी के अनुसार खनिजों/उपखनिजों का परिवहन करने वाले वाहनों को जीपीएस सिस्टम से जोड़ने की प्रक्रिया काफी तेज है और अब तक इसमें लगभग 20 हजार वाहनों का पंजीकरण हो चुका है। इसके अलावा सभी जिलों में ऐसे वाहनों पर नजर रखने के लिए व्हीकल ट्रैफिक सिस्टम (वीटीएस) को भी लागू किया गया है।
प्रदेश के प्राकृतिक संसाधनों और उसमें भी खनिज संसाधनों के समुचित दोहन और प्रबंधन से सरकारी राजस्व को खनिज के मद में बहुत हद तक बढ़ाया जा सकता है। विभाग का राजस्व क्रमशः बढ़ भी रहा है (लगभग 20 प्रतिशत की दर से) लेकिन इस पर और अधिक ध्यान दिए जाने की जरूरत है। सरकार का खजाना भरने वाले विभागों की श्रेणी में अग्रगण्य खनन विभाग के समक्ष बेहतर प्रदर्शन करने में खनन माफियाओं के फतेहपुर जैसे मामले बड़ी बाधा हैं। ऐसे में फतेहपुर जैसी घटनाएं कैसे कम हों, इसके लिए व्यापक विचार-विमर्श की जरूरत है। कुछ ऐसा नया सिस्टम बनाया जाना चाहिए, जिससे फतेहपुर जैसी घटनाएं न्यूनतम स्तर पर पहुंच सकें और विभाग की छवि बेहतर बने।




