संगीत की दुनिया की बेजोड़ शख़्सियत बेगम अख्तर

-आलेख : निहारिका गौड़

(लखनऊ के पसंदबाग में स्थित बेगम अख्तर की मजार)
मियां तानसेन जब राग दीपक छेड़ते थे तो शमां रोशन हो जाती थी। मेघ मल्हार छेड़ते तो बादल मस्त होकर बरसना शुरू कर देते थे…. यादों की गर्द उड़ाकर देखें तो ऐसे कई मशहूर नाम और किस्से-कहानियां इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित हो चुके हैं। इन्हीं में से एक आवाज ऐसी भी थी, जिसके असर से शमां जलती थी, न बारिश होती थी, पर आवाज के जादू से श्रोता ग़ज़ल के मिजाज के मुताबिक कठपुतली की तरह हंसते रोते और गुनगुनाने लग जाते। वो कोई और नहीं ‘मल्लिका-ए तरन्नुम’ बेगम अख्तर हैं।
बेगम अख़्तर की दर्द भरी ज़िंदगी को ग़ज़लों ने ही आज़ादी दी। बड़े प्यार से सहेजे दर्द को उन्होंने अपनी आवाज़ से सजाया। उन्होंने जब बेहज़ाद लखनवी की ग़ज़ल ‘दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे’ गायी तो यही ग़ज़ल उन्हें दुर्गम ऊंचाइयों तक ले गई। उसी विशेषज्ञता के साथ उन्होंने ठुमरी, टप्पा, दादरा, चैती, होरी गायी। उसके जीवन की त्रासदी उसकी आवाज का हिस्सा बन गई और इस तरह वे संगीत की दुनिया में बेजोड़ शख़्सियत बन कर उभरी। फिर उन्होंने कभी पीछे मुड़कर न देखा। दिग्गज शायर कैफी आज़मी ने एक बार बेगम अख़्तर के बारे में कहा था, ‘ग़ज़ल के दो मायने होते हैं, पहला ग़ज़ल और दूसरा बेगम अख़्तर।
एक बार उस्ताद बिस्मिल्लाह खां ने अपने साक्षात्कार में बताया, ‘एक रात मैं और पत्नी सो रहे थे। रात के डेढ़ या दो बजे होंगे, कहीं बेगम अख्तर का रिकॉर्ड बज रहा था- ‘दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे, वरना कहीं तकदीर तमाशा ना बना दे।’ मैं उठकर बैठ गया, मुझे नहीं पता था कि यह कौन गा रहा है, लेकिन मैं उस ग़ज़ल को सुनकर अहा… अहा करने लगा।” पत्नी ने कहा कि यह आप क्या कर रहे हैं? मैंने कहा, “तुम्हें समझ में नहीं आएगा जब सुबह हुई, मैं उस गायिका का नाम जानने के लिए परेशान था। मुझे पता चला कि वह बेगम अख़्तर का गाना था।”
पंडित जसराज भी इसी ग़ज़ल के कारण बेगम अख़्तर की गायकी के दीवाने थे। पंडित जसराज ने कई अवसरों पर बताया है कि जब वे छोटे थे तो रास्ते में उन्हें एक रेस्त्रां में बेगम अख़्तर की ग़ज़ल सुनाई देती थी। उस रेस्त्रां का मालिक प्रतिदिन यही ग़ज़ल बजाया करता था और विद्यालय जाते समय जसराज को सुनने को मिल जाती थी। पंडित जसराज कहते, “ग़ज़ल में जो बात कही गई है, मैं उस समय उस बात को नहीं समझ पाता था। मैं बहुत छोटा था, लेकिन उस गले में, उस आवाज़ में ऐसी बात थी, जिसने मुझे सचमुच दीवाना बना दिया था।”
और हमें तो इस ग़ज़ल ने दीवाना बनाया…तमाम सवालात शायद इसी तरह तो पूछती है ज़िंदगी
वो जो हममें तुममें क़रार था
तुम्हें याद हो के न याद हो
वही यानी वादा निबाह का,
तुम्हें याद हो के न याद हो
वो नये गिले वोह शिक़ायतें,
वो मज़े मज़े की हिक़ायतें
वो हर एक बात पे रूठना
तुम्हें याद हो के न याद हो
कभी हम में तुम में भी चाह थी
कभी हमसे तुमसे भी राह थी
कभी हम भी तुम भी थे आशना
तुम्हें याद हो के न याद हो
वो जो लुत्फ़ मुझ से थे पेशतर,
वो क़रम कि था मेरे हाल पर
मुझे सब है याद ज़र्रा-ज़र्रा,
तुम्हें याद हो के न याद हो
कोई बात ऐसी अगर हुई,
जो तुम्हारी जी को बुरी लगी
तो बयाँ से पहले ही बोलना,
तुम्हें याद हो के न याद हो
जिसे आप गिनते थे आशना
जिसे आप कहते थे बावफ़ा
मैं वही हूँ ‘मोमिन’-ए-मुब्तिला
तुम्हें याद हो के न याद हो …..
दिलों में बसा के मौसिकी का नगर
फिर तय कर लिया अंतिम सफ़र
(फोटो साभार-सोशल मीडिया)




