लखनऊ

बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय में ‘भारतीय ज्ञान परंपरा और हिंदी साहित्य’ पर राष्ट्रीय संगोष्ठी

Lucknow Focus News Desk: बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय (BBAU) में हिंदी प्रकोष्ठ द्वारा ‘भारतीय ज्ञान परंपरा और हिंदी साहित्य’ विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। विश्वविद्यालय के पुराने प्रशासनिक भवन सभागार में हुई इस संगोष्ठी में देशभर से विद्वानों, शोधार्थियों और छात्रों ने हिस्सा लिया।

उद्घाटन सत्र: भारतीय दर्शन की गहराई

संगोष्ठी का उद्घाटन विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. राज कुमार मित्तल ने किया। इस सत्र में अखिल भारतीय साहित्य परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. सुशील चंद्र त्रिवेदी मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल हुए।

लखनऊ विश्वविद्यालय के पूर्व अध्यक्ष प्रो. योगेंद्र प्रताप सिंह ने अपने संबोधन में भारतीय ज्ञान परंपरा की मौलिकता और आधुनिक समय में इसकी प्रासंगिकता पर बात की।

डॉ. सुशील चंद्र त्रिवेदी ने कहा कि भारतीय दर्शन मूल रूप से अध्यात्मवादी है, लेकिन यह भौतिक और आध्यात्मिक दोनों दृष्टिकोणों को समाहित करता है।

अकादमिक सत्र: संस्कृति और साहित्य का संबंध

इस सत्र की अध्यक्षता प्रो. शर्वेश पांडेय ने की। इसमें लेखिका डॉ. शिवानी कटारा और डॉ. विपिन झा ने अपने विचार साझा किए।

प्रो. शर्वेश पांडेय ने कहा कि भारतीय चिंतन परंपरा बहुत गहरी है, जिसमें जीवन, ब्रह्मांड और मानवीय अस्तित्व के विभिन्न पहलुओं पर विचार किया गया है। उन्होंने भारतीय संस्कृति को ‘सामासिक और समन्वयवादी’ बताया।

डॉ. शिवानी कटारा ने कहा कि भारतीय संस्कृति में ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ केवल एक विचार नहीं, बल्कि एक नैतिक सिद्धांत है जो हमें सभी के साथ आदर से व्यवहार करना सिखाता है।

समापन सत्र: वेद से साहित्य तक

समापन सत्र की अध्यक्षता प्रो. बाबूराम ने की। इस सत्र के मुख्य वक्ता लखनऊ विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग के अध्यक्ष डॉ. सौरभ मालवीय रहे।

डॉ. सौरभ मालवीय ने कहा कि भारत का ज्ञानदर्शन वेदों से आया है, और हमारी परंपरा कृतज्ञता व्यक्त करने वाली है। उन्होंने कहा, “जो सनातन है, वो भारत है। जो पुरातन है, वो भारत है। और जो परंपरा है, वो साहित्य है।” वक्ताओं ने साहित्य और समाज के संबंधों पर जोर दिया और आधुनिक युग में हिंदी की बढ़ती भूमिका को रेखांकित किया।

संगोष्ठी के सफल आयोजन में संयोजक डॉ. बलजीत कुमार श्रीवास्तव और सह-संयोजक डॉ. शिवशंकर यादव का विशेष योगदान रहा। कार्यक्रम का संचालन डॉ. शिवशंकर यादव और शशि प्रकाश पाठक ने किया। अंत में, सभी उपस्थित लोगों ने भारतीय ज्ञान परंपरा और हिंदी साहित्य को आत्मसात करने का संकल्प लिया।

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