अंधे मोड़ पर नेपाल

नेपाल में हुई आगजनी,हिंसा और तख्तापलट की घटना के बाद एक बड़ा सवाल यह है कि आखिर किधर जाएगा नेपाल? निश्चित ही नेपाल की राजनीति अब न केवल नए मोड़ पर है, नवनिर्माण की ओर भी है। नया नेपाल कैसा होगा, राजनीति की दिशा क्या होगी और क्या पुराने नेता और पुराने राजनीतिक दलों का अस्तित्व बचेगा भी या नहीं? एस तमाम सवाल है जो नेपाल के राजनीतिक जानकारों और टिप्पणी कारों के मन में उमड़ घुमड़ रहा है।
अंतरिम सरकार ने छ महीने में मध्यावधि चुनाव की घोषणा की है,इस चुनाव का माहौल क्या होगा और चुनाव में पुराने राजनीतिक दलों की अहमियत क्या होगी यह अलग सवाल है। जेन जी जिसके आंदोलन से नेपाल ने भयावह और दुखदाई परिवर्तन को देखा है,वह नेपाल आसन्न चुनाव में जेन जी समर्थक राजनीतिक दल के साथ होगा या पुराने राजनीतिक दलों में से किसी एक पर फिर भरोसा करेगा इस सवाल पर नेपाल में अनिश्चितता का माहौल है। जेन जी समूह ने अभी तो यह कहा है कि वह राजनीति और चुनाव से दूर रहकर इमानदार सरकार के लिए जनजागरण करेगा लेकिन युवाओं का जो समूह अंतरिम सरकार के प्रधानमंत्री और मंत्रियों का चेहरा तय कर रहा हो,वह राजनीति में सक्रिय रूप से भागीदार न हो , इसमें संदेह है। और यदि ऐसा हुआ तो नेपाल की राजनीति निसंदेह युवाओं के कब्जे में होगी। संयोग से इन्हें सरकार बनाने का मौका मिल गया तो नेपाल में सबकुछ विदेश नीति से लेकर व्यापार और पड़ोसी देशों से सदियों पुरानी संधियों तक में व्यापक बदलाव तय है और यह नेपाल के पड़ोसी देशों के लिए चिंता का विषय हो सकता है।
नेपाल ने राजशाही के विरुद्ध लंबे समय तक चले हिंसात्मक जनयुद्ध को भी देखा है। अंततः राजशाही खत्म हुआ और 2008 में संविधान सभा का चुनाव हुआ। इस चुनाव में जनयुद्ध के हीरो बनकर उभरे कट्टर माओवादी नेता प्रचंड की पार्टी सहित पूर्व में स्थापित विभिन्न राजनीतिक दलों ने भी हिस्सा लिया जिसका हासिल यह था कि राजशाही खत्म करने का सेहरा बांधे प्रचंड की पार्टी पूर्ण बहुमत से दूर रही जिसके कि प्रथमदृष्टया आकलन में सत्ता में आने की बहुत बहुत संभावना थी। प्रचंड को प्रधानमंत्री बनने के लिए दूसरे दलों पर निर्भर होना पड़ा और तत्कालीन राष्ट्रपति डाक्टर राम बरन यादव से सेना के एक अधिकारी के तैनाती को लेकर उत्पन्न विवाद के चलते मात्र नौ महीने में ही प्रधानमंत्री पद से त्यागपत्र देना पड़ा। उसके बाद से अंतरिम सरकार के पहले तक नेपाल जोड़ तोड़ और गठबंधन की सरकार के बोझ तले दबे रहने को मजबूर होता रहा।
आसन्न छः महीने बाद होने वाले आम चुनाव में जाहिर है सभी पुराने दल भी मैदान में होंगे जो अभी से अपनी रणनीति बनाने में व्यस्त हो गए हैं। एमाले, नेपाली कांग्रेस, माओवादी केंद्र आदि कई दलों के नेताओं के साथ मार पिटाई हुई है, उनके घर जला दिए गए, सत्ता से हटने को मजबूर किया गया लेकिन इस सब घटना क्रम को देखा जाए तो इसमें परिपक्व और प्रौढ़ जनता की भागीदारी न के बराबर थी, ऐसे में यह कह पाना मुश्किल है कि सत्ता से बलात् हटाए गए राजनीतिक दलों और उनके नेताओं से जनता की भी नाराज़गी थी। इस आंदोलन में जिस आयु वर्ग के युवा शामिल थे उसमें कितने प्रतिशत की आयु वोट डालने लायक थी? ऐसे में ये किशोर वय उम्र के लोग चुनाव में किस तरह की भागीदारी निभा पाएंगे, कहना मुश्किल है। और यह तो बिल्कुल ही तय नहीं है कि आम चुनाव में जेन जी के मनमाफिक लोग ही चुनकर आए और उनकी मर्जी की सरकार बन जाय। ऐसे में इस बात की संभावना ज्यादा है कि जेन जी आंदोलन के बाद भी नेपाल को अपूर्ण बहुमत की ही सरकार फिर नसीब होने वाली है।
इस बीच एक बात चौंकाने वाली जरूर हो सकती है कि उथल पुथल के दौर में पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र भी अपनी नई पारी के लिए कुछ बड़ा कर सकते हैं। अभी दशहरा पर्व पर उनके देश के नाम संदेश में कुछ ऐसा ही संकेत मिल रहा है। दशहरा पर्व के अवसर पर नेपाल में टीका पर्व बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। राजा समर्थक इस बार जेन जी आंदोलन में मारे गए लोगों के श्रद्धांजलि स्वरूप इस पर्व से विरक्त रहे। राजा समर्थक और नेपाल में गोरक्षा अभियान के प्रमुख थानेश्वर अर्याल अच्युत ने कहा कि नेपाल जब खून से लथपथ हो तब ऐसे पर्व और समारोह मनाने की हिम्मत कोई कठोर दिल वाला ही जुटा सकता है।
जेन जी आंदोलन के बाद नेपाल के लोकतांत्रिक ढांचे से लेकर नई सरकार की संरचना और नेपाल का भविष्य सबकुछ अस्पष्ट और अनिश्चित है। नेपाल के राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो हिमालय की गोद में बसा यह नन्हां राष्ट्र अंधे मोड़ पर है।



