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अब सुप्रीम कोर्ट की भर्तियों में भी मिलेगा ओबीसी को आरक्षण, न्यायिक व्यवस्था में ऐतिहासिक बदलाव

Lucknow Focus News Desk: सरकारी नौकरियों और आईआईटी-आईआईएम जैसे शीर्ष शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण मिलने के बाद अब देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट ने भी इस दिशा में एक बड़ा और ऐतिहासिक कदम उठाया है। भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बी.आर. गवई की अध्यक्षता में सुप्रीम कोर्ट ने अपने गैर-न्यायिक कर्मचारियों की भर्तियों में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को भी आरक्षण देने का फैसला किया है।

इस फैसले के तहत अब एससी (अनुसूचित जाति), एसटी (अनुसूचित जनजाति), दिव्यांगजन, पूर्व सैनिक, स्वतंत्रता सेनानियों के आश्रितों के साथ-साथ ओबीसी वर्ग को भी आरक्षण का लाभ मिलेगा। कोर्ट प्रशासन ने इस संबंध में अधिसूचना जारी कर दी है।

1961 के नियमों में हुआ संशोधन

इस बदलाव के तहत ‘सुप्रीम कोर्ट ऑफिसर्स एंड सर्वेंट्स (कंडीशन्स ऑफ सर्विस एंड कंडक्ट) रूल्स, 1961’ के नियम 4A में संशोधन किया गया है। यह संशोधन संविधान के अनुच्छेद 146(2) के अंतर्गत मुख्य न्यायाधीश की शक्तियों का प्रयोग करते हुए किया गया है।

अब यह आरक्षण उन्हीं वेतनमान वाले पदों पर लागू होगा, जिन पर केंद्र सरकार समय-समय पर जारी आदेशों व अधिसूचनाओं के आधार पर आरक्षण देती है। इसका मतलब है कि सुप्रीम कोर्ट की आंतरिक भर्तियों में अब राष्ट्रीय आरक्षण नीति का पालन किया जाएगा।

33 साल बाद मिला ओबीसी को अधिकार

यह फैसला ऐसे समय आया है जब इंदिरा साहनी बनाम भारत सरकार (1992) मामले के ऐतिहासिक निर्णय को 33 साल पूरे हो चुके हैं। तब सुप्रीम कोर्ट की 9-जजों की पीठ ने 27% ओबीसी आरक्षण को संवैधानिक ठहराया था। लेकिन विडंबना यह रही कि सुप्रीम कोर्ट की अपनी भर्तियों में अब तक ओबीसी को आरक्षण नहीं मिल रहा था।

पूर्व केंद्रीय मंत्री अर्जुन सिंह ने अपने कार्यकाल में उच्च शिक्षण संस्थानों में ओबीसी आरक्षण लागू कराया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट का यह कदम अब न्यायपालिका के भीतर सामाजिक न्याय के सिद्धांतों को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ी पहल के तौर पर देखा जा रहा है।

वरिष्ठ वकील पी. विल्सन ने बताया ऐतिहासिक सुधार

राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता पी. विल्सन, जो लंबे समय से सुप्रीम कोर्ट में ओबीसी आरक्षण की मांग कर रहे थे, ने इस फैसले को “ऐतिहासिक सुधार” बताया। उन्होंने कहा कि “अब सुप्रीम कोर्ट की आंतरिक भर्तियों में भी वही मानक लागू होंगे, जो देश की दूसरी केंद्रीय सेवाओं में हैं।”

एससी-एसटी के लिए 200 पॉइंट रोस्टर भी लागू

मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई ने सिर्फ ओबीसी के लिए ही नहीं, बल्कि एससी और एसटी वर्ग के लिए भी एक स्पष्ट रोस्टर प्रणाली लागू करने की पहल की है। यह प्रणाली आर.के. सबरवाल बनाम हरियाणा राज्य (1995) केस में सुझाए गए 200-पॉइंट रोस्टर सिस्टम के अनुरूप होगी।

इस प्रणाली से यह सुनिश्चित होगा कि सामान्य और आरक्षित वर्गों के बीच संतुलन बना रहे और योग्य उम्मीदवारों को उनका संवैधानिक अधिकार मिल सके।

सामाजिक न्याय की ओर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक कदम

भारत के इतिहास में यह पहली बार है जब सुप्रीम कोर्ट ने अपने आंतरिक नियमों में ऐसा सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने वाला व्यापक बदलाव किया है। यह वही अदालत है जिसने दशकों पहले सामाजिक न्याय की अवधारणा को कानूनी मान्यता दी थी, और आज उसी न्याय को अपने भीतर लागू करने की मिसाल पेश की है।

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