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स्वचेतना की अभिव्यक्ति वाली कविताएं

समीक्ष्य पुस्तक ‘नहर किनारे जीवन के आसपास की कविताएं’ चारू खरे का पहला कविता संग्रह है। इसमें संग्रहीत कविताओं को प्रथमदृष्टया देखने से ही यह लग जाता है कि ये कवयित्री के कोमल हृदय की भावनाओं की अभिव्यक्तियां हैं। यहां पर नहर किनारे में नहर से आशय उत्तराखंड के रुड़की शहर की प्रसिद्ध गंग नहर से है। इस शहर में कवयित्री का बचपन बीता और कहना न होगा कि प्राकृतिक छटाओं से समृद्ध इस नगर ने उनके हृदय में कविताकर्म के बीज रोपे। इस संग्रह का मुखपृष्ठ वरिष्ठ मीडियाकर्मी प्रभु झिंगरन ने बनाया है, जो उनके परिपक्व चित्रकार रूप को पाठकों के सामने लाता है।

संग्रह में संग्रहीत कविताओं एक विवेकशील कवयित्री के कोमल मन की छटपटाहट भरी छवि स्पष्ट दिखाई देती है । कुछ रचनाएं देखिए-

‘कहने को हम सभी हैं मानव/संवेदनाओं से भरे पूरे, दुख को महसूसने वाले/फिर क्यों हैं जंग के भूखे रक्त के प्यासे ?’

एक दूसरी कविता देखिएगा- ‘मुझे लगा मुझमें ही पनपा एक एहसास है तू/जड़ें मेरी और तमाम शाखा है तू/तू ही हद है मेरी तू ही जिद है मेरी/फिर मेरी रूह अनछुई क्यों है?’

कवयित्री बचपन की मधुर स्मृतियों में खोती हुई गंग नहर से जुड़ी अपनी स्मृतियों को याद करती हैं। यह कविता देखिए, इसे पढ़कर आप भी अपने बचपन की स्मृतियों में पहुंच जाएंगे-

‘नहर किनारे एक छोटा-सा शहर था / कहने को किराये का मकान

था पर प्यार अपार था / थोड़ी नाराजगी और छोटे-मोटे झगड़े/ बहुत कम में भी खुशियों भरा संसार था।’

मैं क्यों लिखती हूं? शीर्षक कविता में कवयित्री ने आत्मकथात्मक शैली में बताया है कि उनके लिखने का कारण क्या है ? यहां पर छंद काफी परिपक्व हैं। एक बानगी देखिए-

‘बीज और शब्द दोनों ढीठ होते हैं । जब तक खाद पानी नहीं मिलता, जमी पर नहीं पहुंचते, औरों तक नहीं पहुंचते / मैं लिखती हूं अपनी चेतना की अभिव्यक्ति के लिए…।’

संग्रह में संग्रहीत सभी कविताएं अतुंकात शैली में हैं। इन कविताओं में बड़ी सरलता – तरलता है। ये कहीं भी दुरूह और क्लिष्ट नहीं लगतीं। ये हर किसी के लिए बोधगम्य हैं। कुल मिलाकर सहज, सरल और आम बोलचाल के शब्दों में लिखी सभी रचनाएं अपनी भाषा और शिल्प के साथ पूरा न्याय करती दिखाई पढ़ती हैं। संग्रह की कुछ रचनाएं कमजोर जरूर हैं लेकिन उन्हें इसलिए नजरअंदाज कर देना चाहिए क्योंकि यह कवयित्री का पहला काव्य संग्रह है। अगले संग्रह में आने वाली रचनाओं में ऐसी कमजोरी नहीं दिखेगी, ऐसी आशा की जानी चाहिए। यह कविता संग्रह साहित्यिक समाज और काव्य प्रेमियों में अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाए, इसकी हार्दिक शुभकामनाएं।

अखिलेश मयंक

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