विशेष
कविता: मैंने जीना सीख लिया है…

मैंने जीना सीख लिया है…
अंधकार में, दीपक जैसे,
मैंने जलना सीख लिया है।
आशाओं की फसलों को
मैंने सपनों से सींच लिया है।।
“मैंने जीना सीख लिया है’’
चिडियों के जैसे दानों को,
मैंने भी चुगना सीख लिया है।
भूख-गरीबी, लाचारी से,
मैंने डरना छोड़ दिया है ।।
“ मैंने जीना सीख लिया है’’
रिश्तों के ताने-बाने को,
मैंने भी समझना सीख लिया है।
दुख हो चाहे जितना भी,
मैंने अब, हँसना सीख लिया है,
मैंने जीना सीख लिया है।।’’
आकिब खान




