विशेष

कविता: क्या कहूँ, बनारस कैसा है ?

क्या कहूँ, बनारस कैसा है ?

एक सुंदर सपने जैसा है

घाटों से सजी, कुछ मालाओं से….

घिरे गगन के जैसा है।

ईश्वर की सारी लीलाओं,

के पावन किस्सों जैसा है,

’’क्या कहूँ, बनारस कैसा है?’’

जहाँ होती, गंगा आरती,

जहाँ बसते-शिव और पार्वती….

हर-घर मंदिर के जैसा है

जहाँ वेदों के सब ज्ञानी हैं,

यहाँ मीठी सबकी वाणी है।

भोजन अमृत के जैसा है…..

’’क्या कहूँ, बनारस कैसा है?’’

है दुनिया का प्राचीन नगर,

यहाँ घूमे साधू डगर-डगर,

सब, वैदिक काल के जैसा है।

जहाँ मरने पर मिलता है-स्वर्ग,

विद्वान हैं करते तर्क-वितर्क,

एक महाकाव्य के जैसा है.

“क्या कहूँ, बनारस कैसा है?’’

अनिल कुमार त्रिपाठी

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