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मन को झकझोरती अलहदा किस्म की रचनाएं

समीक्ष्य पुस्तक कवि वीरेन्द्र कुमार सिंह का दूसरा कविता संग्रह है। इसके पहले उनका एक कविता संग्रह ‘कोई शोर नहीं होता’ पाठकों के बीच आ चुका है। इस दूसरे कविता संग्रह की अतुकांत शैली में लिखी कविताएं प्रथम दृष्टि में छोटी और मारक हैं। इनकी विषयवस्तु समकालीन समाज में व्याप्त विद्रूपताएं हैं। लगभग हर कवि की विषयवस्तु यही होती है। बस उन विद्रूपताओं को देखने का नजरिया, आब्जर्वेशन और फिर उसका एक्सप्रेशन ऐसे बिंदु हैं, जो यह तय करते हैं कि वह कवि सामान्य भेड़चाल वाले झुंड बनाए चलते कवियों के बीच रहेगा या फिर उन सभी से अलहदा दिखेगा ? वीरेन्द्र कुमार सिंह हर कविता में अपने को भीड़ से अलग और प्रभावी ढंग से पेश करने में समक्ष रहे हैं। उनकी हर कविता झकझोरती है, पाठक को सोचने पर मजबूर करती है। मिसाल के तौर पर कुछ को देखें- ‘

अजीब समय आ गया है/जब सच को खुद को साबित करने के लिए जुटाने पड़ रहे हैं सुबूत/और झूठ को टोकने वाला नहीं कोई/जो खुलकर भर रहा कुलांचे……./’

इसी तरह एक अन्य कविता भी दृष्टव्य है-

‘… इनका हर दिन होली इनकी हर रात दीवाली/तुम्हारे लिए मुश्किल है काटना एक-एक पल जीवन का ये बहकते ही जा रहे अपनी मस्ती में मदहोश/तुम दाल-रोटी के चक्कर में बदहवास खामोश/ये देश के राजपुरुष, तुम देश के आम नागरिक ।’

एक अन्य कविता ‘ठूंठ’ में व्यवस्था को आईना दिखाती हुई ये पंक्तियां देखिए-

‘लोगों ने समझा तुम्हें एक भरा-पूरा संभावनाशील व्यक्ति/पर उम्मीद के खिलाफ तुम निकले बिल्कुल ठुंठ/क्या हो गया था लोगों की आंखों जो देख न सकीं वह खोखलापन, जो था तुम्हारे भीतर…/

कई कविताएं ऐसी हैं जिन्हें पढ़कर रामनाथ ‘अदम गोण्डवी’ की याद आती है। उनकी गजलें इसी तरह व्यवस्था पर तगड़ा प्रहार करती थीं। वीरेन्द्र कुमार सिंह की कविताओं में भी व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह दिखने के साथ उसकी खुली आलोचना भी दिखती है। कई कविताएं ऐसी हैं, जो आपको काफी देर तक सोचने को मजबूर कर देंगी, तो कई ऐसी हैं, जिन्हें पढ़कर आप तुरंत अपने आपको उसके साथ संबद्ध कर देंगे। क्योंकि वह आपको अपनी बात लगेगी। अपना देखा या भोगा गया यथार्थ लगेगा और वह कविता भी क्या जो पाठक के अंतर्मन को झकझोर न दे। उसे छटपटाने को मजबूर न कर दे। इस कसौटी पर इस संग्रह की लगभग सभी कविताएं खरी उतरती हैं। उदाहरण के लिए निम्न कविता को देखें, यह आपको अपना देखा या भोगा हुआ यथार्थ लगेगी-

‘जिन लोगों ने धोखा दिया, जिन लोगों ने घात दिया/जिन लोगों ने छल किया, जिन लोगों ने दंश दिया/उन सबका कोटि-कोटि आभार/क्योंकि न होते वे सब लोग, तो कौन भला बताता/ कैसी है सचमुच में ये दुनिया/ कैसे हैं इसके सरोकार/कैसे एक चेहरे के पीछे छिपे रहते हैं चेहरे हजार।’

संग्रह की सभी कविताएं मजबूत संदेश देने में सक्षम हैं। वे आपको कई तरह के रसों और भावों से ओत-प्रोत करेंगी।

अखिलेश मयंक

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