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ISKCON विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: अब बेंगलुरु ISKCON के पास रहेगा हरे कृष्ण मंदिर का नियंत्रण

Lucknow Focus News Desk: देश के सबसे चर्चित धार्मिक संपत्ति विवादों में से एक पर सुप्रीम कोर्ट ने आज अहम फैसला सुनाया है। बेंगलुरु और मुंबई स्थित ISKCON संगठनों के बीच मंदिर के मालिकाना हक को लेकर चल रहे विवाद में सर्वोच्च अदालत ने बेंगलुरु इकाई के पक्ष में फैसला दिया है।

इस फैसले के साथ ही बेंगलुरु स्थित हरे कृष्ण मंदिर पर अब ISKCON बेंगलुरु का अधिकार बना रहेगा, जबकि कर्नाटक हाईकोर्ट का मुंबई ISKCON के पक्ष में आया फैसला खारिज कर दिया गया है।

क्या था मामला?

हाईकोर्ट के फैसले को दी गई थी चुनौती
मामला बेंगलुरु के हरे कृष्ण मंदिर और उससे जुड़े शैक्षणिक संस्थानों के स्वामित्व से जुड़ा हुआ था। कर्नाटक हाईकोर्ट ने वर्ष 2011 में फैसला सुनाते हुए ISKCON मुंबई को मंदिर का मालिकाना हक दिया था, जिसे ISKCON बेंगलुरु ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।

सुप्रीम कोर्ट में लंबा चला मामला

ISKCON बेंगलुरु ने 2 जून 2011 को सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। हाईकोर्ट का फैसला इससे कुछ दिन पहले 23 मई 2011 को आया था। लगभग 14 साल की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद अब सुप्रीम कोर्ट ने बेंगलुरु इकाई के पक्ष में अंतिम निर्णय दे दिया है।

पहले निचली अदालत का मिला था साथ

बेंगलुरु की एक स्थानीय सिविल कोर्ट ने पहले इस मामले में बेंगलुरु ISKCON के पक्ष में निर्णय दिया था। लेकिन हाईकोर्ट ने उस निर्णय को उलटते हुए मंदिर पर ISKCON मुंबई का हक बताया था। सुप्रीम कोर्ट ने अब हाईकोर्ट के उस फैसले को निरस्त कर दिया है।

दोनों पक्षों की दलीलें क्या थीं?

ISKCON बेंगलुरु का कहना था कि वह एक स्वतंत्र रजिस्टर्ड संस्था है और पिछले कई दशकों से मंदिर का संचालन खुद कर रही है। वहीं, ISKCON मुंबई ने तर्क दिया कि बेंगलुरु इकाई उनकी अधीनस्थ संस्था है, इसलिए मंदिर की संपत्ति पर अधिकार उन्हें मिलना चाहिए था।

किसने दिया सुप्रीम कोर्ट का फैसला?

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस ए. एस. ओका और जस्टिस ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह की बेंच ने यह निर्णय सुनाया। इस मामले की अंतिम सुनवाई 24 जुलाई 2023 को पूरी हुई थी, जिसके बाद आज, लगभग 10 महीने बाद फैसला सुनाया गया। कोर्ट के आधिकारिक पोर्टल के अनुसार, फैसला जस्टिस ओका द्वारा लिखा गया है।

एक ही मिशन, लेकिन अलग राह

यह मामला इसलिए भी चर्चा में रहा क्योंकि दोनों पक्ष इसी आध्यात्मिक मिशन ISKCON से जुड़े हैं, और एक ही उद्देश्य श्रीकृष्ण भक्ति का प्रचार को लेकर काम करते हैं। बावजूद इसके, मंदिर की संपत्ति और नियंत्रण को लेकर कानूनी संघर्ष की नौबत आ गई, जो अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले से समाप्त हो गई है।

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