संकट में वजूद: पुरुषों में बढा़ बांझपन का खतरा, आधे हुए स्पर्म काउंट, सबसे ज्यादा भारतीयों पर असर

नई दिल्ली। इंसानों का वजूद अब खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। जी हां, ‘ह्यूमन रिप्रोडक्शन अपडेट’ जर्नल की रिपोर्ट में ऐसा ही हैरान करने वाला खुलासा हुआ है। शोध में बताया गया है कि पिछले 45 साल में विश्व के पुरुषों का स्पर्म काउंट आधे से ज्यादा कम हो गया है। चौंकाने वाली बात यह है कि भारतीय पुरुषों के स्पर्म काउंट पर सबसे ज्यादा असर पड़ा है। यही नहीं विशेषज्ञों ने इसके लिए भारत में अलग से और अधिक रिसर्च करने की आवश्यकता पर बल दिया है।
53 देशों के 57,000 लोगों पर किया गया रिसर्च
विश्व की तीन बड़ी संस्था मियामी की माउंट सिनाई मेडिकल सेंटर, यरूशलेम का हिब्रू विश्वविद्यालय और कोपेनहेगन विश्वविद्यालय ने मिलकर पुरुषों के स्पर्म काउंट को लेकर एक शोध किया गया। इस शोध रिपोर्ट को 15 नवंबर को ‘ह्यूमन रिप्रोडक्शन अपडेट’ जर्नल में प्रकाशित भी किया है। दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका, एशिया, यूरोप, उत्तरी अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप के 53 देशों के 57,000 लोगों को इस रिसर्च में शामिल किया गया है।
भविष्य में पुरुष बांझपन के शिकार हो सकते हैं
शोध में बताया गया है कि आने वाले समय में पुरुषों के स्पर्म काउंट और ज्यादा तेजी से घट सकते हैं और प्रति मिलीलीटर स्पर्म काउंट 4 करोड़ से कम होने पर तो पुरुष बांझपन के शिकार हो सकते हैं। या हम कह सकते हैं कि पुरुषों में नपुंसकता बढ़ रही है और बच्चा पैदा करने की क्षमता में गिरावट आ रही है। इसलिए सीमन में स्पर्म काउंट कम होना चिंता का विषय बनता जा रहा है।
सीमन में स्पर्म काउंट कम होने के कारण
खाना, पानी और हवा के जरिए शरीर में एंडोक्राइन डिसरप्टिंग केमिकल पहुंचता है। इसकी मात्रा बढ़ने से शरीर के दूसरे हॉर्माेन प्रभावित होते हैं।
पुरुषों के स्पर्म काउंट का कम होना काफी हद तक प्रदूषण पर भी निर्भर करता है।
ज्यादा धूम्रपान और शराब की लत, मोटापा और अनुचित खान-पान, पुरुषों के शरीर में टेस्टोस्टेरोन हॉर्माेन के असंतुलन के अलावा प्राइवेट पार्ट में इंफेक्शन और अन्य यौन रोग ही मुख्य हैं।
अस्तित्व रक्षा के लिए स्वच्छ वातावरण बहुत ही जरूरी
रिपोर्ट में कहा गया है कि इंसानों के साथ ही अन्य दूसरे जीव-जंतुओं को सुरक्षित रखने के लिए स्वच्छ वातावरण बहुत ही जरूरी है। वर्तमान में प्रदूषण और खराब लाइफस्टाइल एक बड़ी चुनौती है और अगर इसे शीघ्र और सही तरीके से नहीं निपटा गया तो इंसानों का वजूद खतरे में पड़ जाएगा।




