हिंदी की महान विभूतियों को श्रद्धांजलि: लखनऊ में विशेष संगोष्ठी, साहित्यकारों ने तुलसीदास, प्रेमचंद को बताया ‘प्रेरणा पुरुष’

Lucknow Focus News Desk: उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान में आयोजित एक विशेष संगोष्ठी में हिंदी साहित्य की चार महान विभूतियों – गोस्वामी तुलसीदास, आचार्य परशुराम चतुर्वेदी, प्रेमचंद और चंद्रधर शर्मा गुलेरी को भावभीनी श्रद्धांजलि दी गई। यह आयोजन साहित्यिक चर्चा, संगीत और स्मृतियों को समर्पित था, जिसमें विद्वानों, लेखकों और संगीतज्ञों ने हिस्सा लिया।
कार्यक्रम का शुभारंभ माँ सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण और दीप प्रज्वलन से हुआ। श्रीमती गीता शुक्ला की वाणी वंदना ने पूरे माहौल को आध्यात्मिक बना दिया। मंच पर उपस्थित अतिथियों का स्वागत संस्थान की ओर से डॉ. अमिता दुबे ने किया।
तुलसीदास का साहित्य गंगा के समान हितकारी – डॉ. हरिशंकर मिश्र
साहित्यकार डॉ. हरिशंकर मिश्र ने गोस्वामी तुलसीदास को ‘प्रेरणा पुरुष’ बताया और कहा कि उनका साहित्य लोक कल्याण की भावना से भरा हुआ है। उन्होंने रामकथा को आम लोगों की भाषा में प्रस्तुत किया, जिससे धर्म, नीति और आदर्श लोगों तक आसानी से पहुँचे। डॉ. मिश्र ने तुलसीदास के साहित्य को गंगा की तरह हितकारी बताया, जो सभी के लिए उपयोगी और प्रेरणादायी है। उन्होंने कहा कि तुलसीदास के विचारों के अनुसार, एक संत की पहचान उसके कपड़ों या बातों से नहीं, बल्कि उसके स्वभाव और आचरण से होती है।
आचार्य परशुराम चतुर्वेदी: संत साहित्य के आधार स्तंभ
साहित्यकार असित चतुर्वेदी ने आचार्य परशुराम चतुर्वेदी के योगदान को याद किया। उन्होंने कहा कि आचार्य चतुर्वेदी भले ही पेशे से वकील थे, लेकिन उनका जीवन संत साहित्य की साधना को समर्पित था। उनकी पुस्तक ‘उत्तरी भारत की संत परंपरा’ आज भी संत साहित्य पर शोध का एक प्रमुख आधार मानी जाती है। असित चतुर्वेदी ने कहा कि सरस्वती की आराधना करने वाले लोग कभी नहीं मरते, वे अपने साहित्य के माध्यम से हमेशा जीवित रहते हैं।
प्रेमचंद का लेखन आज भी प्रासंगिक – नरेंद्र भूषण
प्रेमचंद के साहित्य पर बात करते हुए साहित्यकार नरेंद्र भूषण ने कहा कि उनका लेखन आज भी समाज के हर स्तर पर उतना ही प्रासंगिक है। उन्होंने नवाब राय के नाम से लिखना शुरू किया, लेकिन जल्दी ही ‘प्रेमचंद’ के नाम से एक बड़ी पहचान बना ली। उनकी प्रसिद्ध रचनाएँ ‘गोदान’, ‘गबन’, ‘रंगभूमि’ और ‘निर्मला’ सामाजिक बुराइयों पर तीखा प्रहार करती हैं। नरेंद्र भूषण ने कहा कि प्रेमचंद का साहित्य सिर्फ भावनाओं को नहीं छूता, बल्कि उसमें समाज सुधार की एक गहरी ललक भी दिखती है।




