अनियोजित शहरीकरण और ‘नियोजित’ जलभराव

अखिलेश मयंक
‘पहली बारिश ने नगर निगम की पोल खोली’, ‘पहली बारिश से शहर पानी-पानी’, ‘सड़क से घर तक व्यवस्था पानी-पानी’, ‘पहली बारिश में ही नगर निगम के दावे हवा हवाई… ये महानगरों से प्रकाशित होने वाले अखबारों में छपने वाले ऐसे शीर्षक है। जो पहली बारिश के अगले दिन अखबारों के लोकल पेजों को सोभा बढ़ाते हैं। जो पत्रकार साथी ये शीर्षक लगाते हैं, न वे इसकी एकरसता से ऊबते हैं, न ही शहर की बेहतरी के लिए जिम्मेवार सरकारी अफसरों के कानों पर कोई जूं रेंगती है। हर वर्ष बरसात का मौसम आता है, उसके पहले शहरों के नालियों-नालों की सफाई का अभियान चलाया जाता है लेकिन बारिश होने पर इन अभियानों का नतीजा सिफर ही रहता है।
इस समय बारिश से देश के कई शहर हलकान है। बारिश की शुरुआत के पहले इन शहरों के जाम चल रहे नाले-नालियां, सीवर लाइन आदि साफ किए गए थे। किन्हीं कारणों से बंद किए गए और अतिक्रमण करके पाटे गए नालों को दुरुस्त किया गया था। आसपास बहती नदियों की गाद को साफ किया गया था। कड़े से अटे पड़े मार्गों की भी सफाई की गई थी। कूड़े का उचित स्थान पर और उचित विधि से निस्तारण भी किया गया था लेकिन जब बारिश हुई तो इन शहरों में इन सभी उपायों का कोई फायदा नहीं मिलता दिखा। सब कुछ पहले जैसा ही होता दिखा-उफनाए नाले, पानी से लबालब भरी सड़कें और अंडरपास, कालोनियों और उसमें बने आवासों में घुसा पानी, सड़कों का धंसना और इन सभी समस्याओं के चलते पूरे शहर का ट्रैफिक जाम की भेंट चढ़ जाना बदस्तूर दिखा।
लखनऊ भी इसका अपवाद नहीं रहा। यहां भी व्यवस्था हर वर्ष की ही तरह दिखी। यह स्थिति तब है, जब लखनऊ इस वर्ष देश के सर्वाधिक स्वच्छ शहरों की सूची में तीसरे स्थान पर रहा है (अहमदाबाद और भोपाल क्रमशः पहले व दूसरे स्थान पर रहे हैं)। यही नहीं, उसने शिबरी जैसी जगह को साफ-सुथरा बना दिया, जहां कभी कूड़े का बहुत ही ऊंचा ढेर (उसे पहाड़ कहना ज्यादा उचित होगा) हुआ उन्हीं समस्याओं से दो-चार होते नजर त्रस्त दिखे। बंगलुरु, जो कभी झीलों सब समस्याओं से ग्रसित दिखता है, कालोनियां बना दी गई हैं। आज बंगलुरु महानगर को एक अलग मकसद से के तहत बसाया गया था।
दरअसल, इन सालाना मुश्किलों का विचार और व्यवहार में छुपा हुआ है।
करता था। लेकिन लखनऊवासी भी आए, जिनसे अन्य महानगरों के वासी का शहर कहा जाता था, आज इन्हीं क्योंकि अधिकांश झीलों को पाटकर को देखकर लगता ही नहीं कि इस विशेष और एक दूरदर्शी मास्टरप्लान
हल शहर के नागरिकों के आचार- ये बेहद दुखद है कि लोगों में इतना में इतना अपने घर के सामने की नाली को न बनाने के बाद आसपास की खाली पड़ी जमीन को सीमेंट से पक्की न करें। अगर आसपास की जमीन सीमेंट से पक्की नहीं की गई होगी तो वह बरसाती पानी को सोखेगी, जिससे न केवल जलभराव की समस्या कम होगी, बल्कि वहां का भूजल स्तर भी रीचार्ज होगा, जो खतरनाक रूप से दिनोंदिन नीचे जा रहा है। शहरों में नाले-नालियों पर जो लोग अतिक्रमण करके अपना काम और कारोबार चलाते हैं, उनकी सख्त निगरानी की जानी चाहिए। उन पर कार्रवाई भी होनी चाहिए। ऐसा नहीं है कि संबंधित नगर निकाय के अफसरों को नाला- नाली पर अतिक्रमण की जानकारी नहीं होती।
दरअसल, इन सार्वजनिक स्थलों पर अतिक्रमण करने वाले चांदी के जूते मारकर इन अफसरों का मुंह बंद कर देते हैं। इसलिए वे सब कुछ देखते हुए भी उधर से अपनी आंखें मूंदे रहते हैं और साल-दर-साल यही खेल चलता रहता है।
अगर नई बनी सड़कें धंस या टूट रही हैं तो संबंधित विभाग और उस काम को करने वाले ठेकेदार की त्वरित जवाबदेही तय की जानी चाहिए। बल्कि सड़क के टेंडर में ही यह शर्त अनिवार्य रूप से जोड़ी जानी चाहिए कि अगले इतने वर्षों तक अगर सड़क धंसी या टूटी तो उसे बनाने का काम उस ठेकेदार का ही होगा। वैसे सामान्यतया सरकारी टेंडर की शर्तें काफी कड़ी होती हैं लेकिन विभागीय अफसरों की कमीशनखोरी के चलते उन शर्तों का कड़ाई से पालन नहीं करवाया जाता। ऐसे में संबंधित ठेकेदार या कार्यदायी संस्था की रुचि टेंडर से मिले काम की गुणवत्ता बेहतर करने में कम, संबंधित अफसरों को खुश करने में ज्यादा रहती है। इसी के साथ-साथ तेजी से बढ़ रहे अनियोजित शहरीकरण पर भी नियंत्रण की जरूरत है। आज किसी भी बड़े शहर के आसपास के गांवों शहरों का हर व्यक्ति चाहता है कि नजदीक के बड़े और प्रतिष्ठित शहर में भी उसका छोटा-सा ही सही, एक मकान हो। यही ललक उस व्यक्ति को बड़े शहर खींच लाती है, जिससे अनियोजित शहरीकरण को बढ़ावा मिलता है। लोग-बाग सरकारी नियमों-कानूनों का पालन किए बिना मकान खड़ा कर देते हैं। बाद में उन्हें हटाने में बहुत-सी व्यावहारिक दिक्कतें आती हैं और वे यथास्थिति बनाए रखने के साथ ही शहर के चेहरे पर नासूर की तरह रिसते रहते हैं।
अगर बारिश में शहरों को डूबने से बचाना है तो नदियों, नालों, नालियों की सफाई का काम नगर निगम या अन्य संबंधित विभाग या शहरी निकाय ईमानदारी से करें। इसके साथ ही साथ नागरिकों को अधिक से अधिक जागरूक बनाया जाए। ताकि हर शहरवासी अपने कर्तव्यों का पालन करे। क्योंकि अधिकार मांगना और उसके प्रति जागरूक रहना जितना जरूरी है, अपने कर्तव्यों का पालन करना भी उतना ही आवश्यक है।




