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वर्ण व्यवस्था, आरक्षण और न्याय

डॉ. आमोदकांत

ऋग्वैदिक काल का समाज कर्मप्रधान था। उस युग में मनुष्य का स्थान जन्म से नहीं, बल्कि उसके गुण, आचरण और कर्म से निर्धारित होता था। ब्राह्मण वह था जो ज्ञान, तप और सत्य की खोज में निरंतर प्रवृत्त रहता; क्षत्रिय वह था जो शासन और सुरक्षा का भार उठाता; वैश्य वह था जो व्यापार और उत्पादन में संलग्न रहता; और शूद्र वह था जो श्रम व सेवा के माध्यम से समाज की नींव को मजबूती प्रदान करता। यह विभाजन कठोर नहीं था, बल्कि गतिशील था। व्यक्ति अपने कर्मों के अनुसार अपना स्थान बदल सकता था और समाज उसे उसी रूप में स्वीकार करता था। यही कारण था कि महर्षि विश्वामित्र, जो जन्म से क्षत्रिय थे, वेदों की गहन साधना और तपस्या के बल पर ब्रह्मर्षि कहलाए। महर्षि वाल्मीकि, जो प्रारंभिक जीवन में शूद्र वर्ण से जुड़े थे, ज्ञान और साहित्यिक सृजन की शक्ति से समस्त मानवता को रामायण जैसा अमर ग्रंथ प्रदान कर महर्षि की संज्ञा पाए। इस प्रकार के उदाहरण स्पष्ट करते हैं कि उस समय कर्म ही पहचान थी, जन्म केवल एक प्रारंभिक अवस्था।

इस व्यवस्था को गहराई से देखें तो यह एक प्रकार का आरक्षण ही था। जिस प्रकार आज आरक्षण सामाजिक न्याय और अवसर की समानता सुनिश्चित करने का माध्यम है, उसी प्रकार ऋग्वैदिक समाज में वर्ण परिवर्तन ने हर व्यक्ति को अपने कर्म और गुणों के बल पर समाज में ऊपर उठने का अवसर दिया। यदि कोई व्यक्ति अपने कर्म बदलकर ब्राह्मण बनता था, तो समाज उसे उसी सम्मान और अधिकार से स्वीकार कर लेता था। किंतु साथ ही यह नियम भी कठोर था कि उसे अपने पूर्व वर्ण की सुविधाओं और अधिकारों का परित्याग करना होता था। यदि कोई क्षत्रिय तपस्या और वेदज्ञान से ब्राह्मण बन गया, तो उसे क्षत्रिय वर्ण की सुविधाओं का लाभ नहीं मिल सकता था। इसी प्रकार यदि कोई वैश्य युद्धकला और शासन की ओर प्रवृत्त होकर क्षत्रिय बना, तो उसे अपने नए उत्तरदायित्वों को निभाना ही पड़ता था। इस दृष्टि से देखें तो यह एक न्यायपूर्ण और संतुलित व्यवस्था थी, जिसमें अधिकार और दायित्व दोनों का संगम था।

आरक्षण के मुद्दे को इस प्रकार भी समझा जा सकता है। आज यदि किसी दलित या पिछड़े परिवार का एक सदस्य शिक्षा और परिश्रम के बल पर बड़ा अधिकारी बन जाता है, तो उसे समाज में वही स्थान प्राप्त होता है, जो ऊँची कही जाने वाली जातियों के लोगों को मिलता है। लेकिन दुखद तथ्य यह है कि वह अधिकारी प्रायः यह भूल जाता है कि वह किस पृष्ठभूमि से आया है। वह स्वयं को तथाकथित उच्च जातियों के बराबर मानकर अपने ही बंधु-बांधवों से दूरी बनाने लगता है। अपने व्यवहार और आचरण में वह उन्हीं की नकल करता है और धीरे-धीरे अपने ही समाज का शोषक बन बैठता है। यह विडंबना इस बात का संकेत है कि आधुनिक आरक्षण व्यवस्था की आत्मा को हम अभी तक ठीक से आत्मसात नहीं कर पाए हैं। सही तो यह होना चाहिए कि जो दलित अथवा पिछड़ा वर्ग का व्यक्ति आर्थिक और सामाजिक रूप से सशक्त हो चुका है, वह आरक्षण का लाभ छोड़ दे। जिस प्रकार ऋग्वैदिक काल में नया वर्ण स्वीकार करने के साथ पुराने अधिकार और विशेषाधिकार स्वतः समाप्त हो जाते थे, उसी प्रकार आज भी यदि कोई व्यक्ति एक नई ऊँचाई पर पहुँच गया है, तो उसे आरक्षण की सुविधाओं का त्याग कर देना चाहिए। तभी समाज में अवसर की समानता और न्याय का संतुलन बना रह सकता है।

समस्या यह है कि आधुनिक समाज में बुद्धिजीवी वर्ग इस मूल भावना को समझने का प्रयास नहीं करता। वह केवल आलोचना करता है, परंतु यह नहीं देखता कि ऋग्वैदिक व्यवस्था में आरक्षण और समानता दोनों का गहरा तात्त्विक संबंध था। वहाँ किसी को आगे बढ़ने से रोका नहीं जाता था, लेकिन आगे बढ़ने के बाद उसके अधिकार और कर्तव्य उसी नए वर्ग के अनुरूप तय हो जाते थे। आधुनिक आरक्षण व्यवस्था यदि इस सिद्धांत पर चले तो यह न केवल अधिक न्यायपूर्ण होगी, बल्कि सामाजिक समरसता का आधार भी बनेगी।

आज के समय में यदि ब्राह्मणत्व की परिभाषा की जाए, तो यह निश्चित रूप से जन्म से नहीं, बल्कि ज्ञान और तपस्या से तय होगी। इस दृष्टि से देखें तो आधुनिक वैज्ञानिक और शोधकर्ता वही भूमिका निभा रहे हैं, जो प्राचीन काल में ऋषियों और मुनियों ने निभाई थी। वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं में बैठकर सत्य की खोज करते हैं, प्रकृति के रहस्यों को उजागर करते हैं, नई औषधियाँ और तकनीक विकसित करते हैं, जिससे मानव जीवन उन्नत और सुरक्षित होता है। वे निरंतर अध्ययन और प्रयोगों में संलग्न रहते हैं, ठीक वैसे ही जैसे प्राचीन ऋषि यज्ञ और तपस्या के माध्यम से ज्ञान की साधना करते थे। इसलिए कहा जा सकता है कि आज का वैज्ञानिक ही सच्चा ब्राह्मण है।

निष्कर्षतः, ऋग्वैदिक समाज की वर्ण व्यवस्था केवल कर्माधारित नहीं थी, बल्कि अवसर, उत्तरदायित्व और न्याय के गहरे संतुलन पर आधारित थी। जो व्यक्ति अपने कर्म बदलकर नई स्थिति प्राप्त करता था, उसे नया सम्मान और अधिकार मिलते थे, लेकिन साथ ही पुराने अधिकार स्वतः समाप्त हो जाते थे। यदि आधुनिक समाज इस सिद्धांत को आत्मसात कर ले, तो आरक्षण की व्यवस्था कहीं अधिक न्यायपूर्ण और प्रभावी हो सकती है। जब सशक्त और सम्पन्न लोग आरक्षण का त्याग करेंगे और अवसर उन तक पहुँचेंगे जिन्हें सचमुच उनकी आवश्यकता है, तभी समाज में सच्चा न्याय और समरसता स्थापित होगी। यही ऋग्वैदिक परंपरा का वास्तविक संदेश भी है और यही आधुनिक भारत के लिए उचित दिशा भी।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। इस आलेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं।)

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