क्यों अजेय हैं मोदी? 25 सालों का राज: सीएम से पीएम तक, ये हैं 7 बड़ी वजहें

Lucknow Focus News Desk: लगातार आलोचना, विरोध और चुनौतियों के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि एक ‘मजबूत नेता’ के रूप में बनी हुई है। पिछले 25 वर्षों से (13 साल मुख्यमंत्री और 11 साल प्रधानमंत्री) वे भारतीय राजनीति में अजेय बने हुए हैं। आखिर क्या हैं वे कारण जो उन्हें लगातार लोकप्रिय बनाए रखे हैं? आइए जानते हैं 7 बड़ी वजहें:
राष्ट्रवाद, विकास और हिंदुत्व का शक्तिशाली मिश्रण
मोदी ने राष्ट्रवाद, विकास, धर्म और कल्याणकारी योजनाओं को मिलाकर एक ऐसा मजबूत संदेश दिया है कि विपक्ष अक्सर उनका जवाब देने में उलझा रहता है। सर्जिकल स्ट्राइक (2016), बालाकोट एयर स्ट्राइक (2019) और ऑपरेशन सिंदूर (2025) ने उनकी ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ की छवि को और मजबूत किया। वहीं, धारा 370 का खात्मा और CAA-NRC ने ‘मजबूत भारत’ का संदेश दिया।
आर्थिक मोर्चे पर, ‘विकसित भारत 2047’ का विजन पेश किया गया, जबकि ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘डिजिटल इंडिया’ ने युवाओं को आकर्षित किया। राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा और ‘जय श्री राम’ के नारे ने हिंदू आबादी को एकजुट किया। इन कदमों की आलोचना होने के बावजूद मोदी अपनी राह से डिगे नहीं।
विरोधियों को दोस्त बनाने की कला
मोदी की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वे अपने कड़े विरोधियों को भी सहयोगी बना लेते हैं। इस कला ने विपक्ष को कमजोर किया है। उदाहरण के लिए, कभी भाजपा के कट्टर आलोचक रहे नीतीश कुमार आज फिर NDA में लौट आए हैं। इसी तरह, कांग्रेस के पूर्व नेता गुलाम नबी आजाद और असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा, जो कभी मोदी की आलोचना करते थे, आज उनके साथ हैं। यह रणनीति भाजपा को मजबूत करती है और विपक्ष को बिखेर देती है।
‘दक्षिणपंथी-समाजवाद’ से खड़ी की समर्थकों की फौज
मोदी ने अपनी नीतियों में समाजवाद और दक्षिणपंथ का अनूठा मिश्रण किया है। उनकी योजनाएं जैसे जन धन योजना, आयुष्मान भारत, उज्ज्वला योजना, और पीएम-किसान योजना सीधे गरीबों और वंचितों को लाभ पहुंचाती हैं। दूसरी ओर, राम मंदिर निर्माण और ‘जय श्री राम’ जैसे नारे हिंदुत्व और राष्ट्रवाद को बढ़ावा देते हैं। इस दोहरी रणनीति ने गरीब से लेकर अमीर तक हर वर्ग में उनके समर्थकों की फौज खड़ी कर दी है।
राज्य सरकारों को नहीं छेड़ा, जीता राज्यों का दिल
मोदी के मजबूत नेतृत्व के बावजूद, उन्होंने लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान किया। उनके कार्यकाल में किसी भी राज्य सरकार को बेवजह बर्खास्त नहीं किया गया। संविधान के अनुच्छेद 356 का इस्तेमाल न्यूनतम रहा, जो इंदिरा गांधी के शासनकाल की तुलना में बहुत कम है। इस सद्भाव ने राज्यों का दिल जीता और उनके खिलाफ सत्ता विरोधी लहर (एंटी-इनकंबेंसी) को पनपने नहीं दिया।
‘मोदी है तो मुमकिन है’: दृढ़ फैसले लेने की क्षमता
मोदी की सबसे बड़ी पहचान उनकी दृढ़ता है। नोटबंदी (2016), धारा 370 का खात्मा (2019), और कोविड-19 लॉकडाउन (2020) जैसे कठिन फैसलों ने उनकी ‘मजबूत इच्छाशक्ति’ की छवि बनाई। ऑपरेशन सिंदूर (2025) जैसे कदमों ने ‘कड़ी कार्रवाई’ का संदेश दिया, जिसने उनके समर्थकों को और मजबूत किया। यह दृढ़ता ही है कि उनके समर्थक कहते नहीं थकते- ‘मोदी है तो मुमकिन है’।
जरूरत पड़ने पर पीछे भी हटे, मगर गरिमा के साथ
मोदी ने हमेशा सत्ता के अहंकार से दूर रहकर जरूरत पड़ने पर पीछे हटने का भी साहस दिखाया। किसान आंदोलन के दौरान उन्होंने गरिमा के साथ कृषि कानूनों को वापस लिया। जीएसटी दरों को कम करने और सहयोगियों को बराबर का महत्व देने जैसे फैसले भी उनकी दूरदर्शिता को दर्शाते हैं।
‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा’: बेदाग छवि
भारतीय राजनीति में दशकों तक भ्रष्टाचार और परिवारवाद का बोलबाला रहा है। ऐसे में, मोदी ने अपनी ‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा’ की नीति से खुद को एक ईमानदार नेता के रूप में स्थापित किया। राफेल और अडानी जैसे मामलों में विपक्ष के आरोपों के बावजूद जनता ने उन पर भरोसा जताया। आज भी जब लगभग सभी बड़ी पार्टियाँ परिवारवाद में घिरी हैं, मोदी ने खुद को परिवार और रिश्तेदारों से दूर रखकर एक बड़ा संदेश दिया है, जिसने उनके लिए साइलेंट वोटर्स का एक बड़ा वर्ग खड़ा कर दिया है।