सपनों के पंख

घर के सारे लोग बाहर खड़े थे। किसी की हाथ में आरती की थाली थी तो किसी के हाथ में फूलों की माला। पापा मिठाई का डिब्बा लेकर इंतजार कर रहे थे तो मम्मी अपनी बिटिया को गले लगाने को बेताब खड़ी थीं।
‘नीट’ का रिजल्ट आ गया है जिसमें गौरी की अच्छी रैंकिंग आई है यानि कि वो अब डाॅक्टर बन जाएगी। पूरे घर के लिए यह आश्चर्य की बात थी। किसी ने सोचा भी नहीं था कि जिस इच्छा को वे बेटे के नाम से पूरी करना चाहते थे उसे बेटी ने कर दिखाया।
आज याद करती हूँ तो याद आते हैं वे दिन…..
गाँव की सीधी-सी सड़क पर मिट्टी की खुशबू और आम के पेड़ों की छाँव थी। सब कुछ सुना-सा, शांत-सा। पर उस शांत वातावरण के बीच भी एक नवजात की किलकारी गूँजती थी जिसे किसी ने जैसे सुनी ही नहीं एक उपेक्षित कन्या की किलकारी, जिसका नाम था गौरी
बस उसका दोष केवल इतना था कि उसका चेहरा गाँववालों की नज़रों में अलग था। वह काली थी — गहरे भूरे से काली….जिन हँसी-ठिठोली को लोग अनायास कह देते थे। गाँव के चौपालों में, स्कूल के खेल में, पड़ोस के मेले में — कहीं भी कोई मौका मिलता तो कोई टिप्पणी, कोई ताना उसे चुभाने के लिए हरदम तैयार रहता।
गौरी, जिसके पैदा होने पर किसी को कोई खुशी नहीं हुई, अलबत्ता उसके गहरे रंग को देख दादी और बुआ दुखी ही हुईं। अम्मा ने उसका नाम गौरी रखा था जो कि बाद में लोगों द्वारा उपहास उडाने के लिए गोरी में बदल गया। अम्मा का दिल दुखाने के लिए निपट निरक्षर बुआ जब भी घर आती दादी से कहती कि इस काली मैया का नाम गोरी किसने रख दिया है। अम्मा जल भुन जातीं पर कुछ कह नहीं पाती थीं। तिसपर बुआ की शह और बढ़ जाती और अम्मा को उलाहना देते हुए कहतीं-
“ऐसी काली बिटिया किस काम की?”
“दिखती तो ठीक है पर शादी में क्या करेगी?”
“इसे घर के काम सिखाओ ताकि काम का हवाला देकर ही शादी कराई जा सके।”
दिन महीने साल बीतते गए, अम्मा ने घर का सारा काम गौरी के ऊपर ही छोड़ रखा था। एक अम्मा के अलावा किसी को उसकी पढ़ाई की रत्ती भर फिक्र नहीं थी। हाँ, उसके भाई आर्यन को वे मेडिकल के क्षेत्र में भेजना चाहते थे। भाई लगातार ट्यूशन करता रहा और गौरी हर उपेक्षा और अपमान के बाद और भी दृढता से अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ती गई। किसी को कुछ पता ही नहीं चला कि रात के किस पहर वह मेडिकल में प्रवेश करने की ठान रखी है।
गौरी घर के छोटे से आँगन में माँ के साथ खाना बनाती, भाई के लिए किताबें बाँधती और स्कूल की पढ़ाई में मन लगाती। अम्मा अक्सर कहती, “ तेरी आत्मा सच्ची और खूबसूरत है। लोग क्या कहते हैं, उसकी चिंता मत कर।” पर सहपाठियों की हँसी, टीचर की वो नज़र, बाजार में गुज़रते लोगों की टिप्पणी — सब कुछ उसके भीतर एक सन्नाटा छोड़ देता था।
एक दिन स्कूल में विज्ञान की प्रतियोगिता हुई। गौरी ने मेहनत से प्रोजेक्ट बनाया — “पानी की शुद्धि के घरेलू तरीके।” उसने छोटे-छोटे फिल्टर बनाए जो गाँव के नालों के पानी को पीने योग्य बनाते। प्रोजेक्ट न केवल व्यावहारिक था बल्कि गाँव के परिवारों की ज़रूरत का भी हल था। पर परिणाम घोषित होते समय, जब विजेता के रूप में उसका नाम नहीं आया तो उसके होठों पर निशब्द सवाल झलक उठा। उसने खुद को संभाला और कहा, “हमें फिर से कोशिश करनी है।” पर उसी दिन उसे स्कूल के बाहर कुछ लड़कों ने छेड़ते हुए कहा, “कल इस काली लड़की को कौन देखेगा गाँव में?” उस रात गौरी की नींद टूटी — पर सुबह उसने फिर वही ठान ली: उसे दुनिया को यह दिखाना है कि रंग इंसान की काबिलियत नहीं तय करता।
समय न रुका था न रुकेगा। गौरी की पढ़ाई जारी रही। कॉलेज में दाखिला हुआ — गाँव से शहर जाने का पहला अनुभव चौंका देने वाला था। शहर के लोग, शहर की तेज़ रफ़्तार, और सबसे बड़ी बात — वहाँ रंग पर जो टिप्पणी गाँव में मिलती थी, वह कहीं कम थी। लेकिन गौरी के अंदर का बैग भारी था — वर्षों की टिप्पणीओं की बोझिल यादें। उसने मेडिकल फील्ड चुना। डॉक्टर बनना— यही उसकी बचपन की चाह थी। लोगों ने कहा, “तू कैसे? पैसों की कमी, तैयारी का समय, घरवालों की जिम्मेदारियाँ।” पर गौरी का मन कहता: “अगर मैं ठीक से पढ़ूँ, अगर मैं खुद पर विश्वास करूँ, तो मेरे अंदर की चमक कहीं भी छिपी नहीं रहेगी।”
गौरी ने मेहनत की। दिन-रात पुस्तकें, पैपराज़, नोट्स। रातों को जब शहर सोता, गौरी टेबल पर बैठकर मानव शरीर की किताबों में खो जाती। अम्मा के शब्दों की सादगी और प्रोत्साहन उसे दृढ बनाता। “बेटी, तुझे जानती हूँ। तू डॉक्टर बनेगी।” यह वाक्य किसी जादू जैसे काम करता — गौरी की आँखों में फिर से उम्मीद की रौशनी जल जाती।
नीट की परीक्षाएँ आईं और गौरी ने आवेदन कर दिया। पैसे की तंगी थी, पर गाँव के कुछ लोग जिन्होंने उसके प्रोजेक्ट का लाभ उठाया था, उन्होंने छोटी-छोटी रकम भेजकर मदद की । परीक्षा के दिन उसने गहरी साँस ली और कागज़ में अपनी सारी तैयारी उतार दी।
अम्मा ने बस कहा, “आरती कर लूँ मैं तेरे लिए।” उस छोटे से आशीर्वाद ने गौरी को फिर डबल शक्ति दी।
पर समाज को बदलना आसान नहीं होता। गौरी को कॉलेज में और भी आहत करने वाली टिप्पणियाँ मिलीं। कई दोस्त और रिश्तेदार कहते, “ हम भी तो देखें काले रंग का कमाल….आखिर में तो चूल्हा चक्की ही करनी पडेगी…शादी ब्याह तो पक्का मुश्किल होगा।”
यह सब सुनते सुनते उसके कान पक चुके थे। तानों को सहने की एक अलग सहनशक्ति उसमें विकसित होती जा रही थी…वह दिन पर दिन कमजोर नहीं बल्कि और मजबूत बनती जा रही थी। उसने खुद को इतना ठोस कर लिया था कि हर झटका उसके भीतर के संकल्प को और कसकर पक्का कर देता । उसकी मन में यह सवाल अक्सर उठता — अगर आज मैं हार गई तो शायद किसी और लड़की के लिए राह सुगम होगी….
समय बीतता गया आखिरकार वो दिन भी आ गया जब दोनों भाई बहनों ने फार्म भरा और तैयारियां शुरू कर दी। कुछ दिनों बाद इम्तिहान और फिर वो घड़ी भी आई जब गौरी का दिल तेज़ी से धड़क रहा था। उसने ऑनलाइन रिजल्ट खोला और शब्द पढ़कर उसके होंठ कंपकंपाने लगे…. “सफल — मेडिकल में प्रवेश स्वीकृत।” गौरी की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। वह रोते हुए मां के गले लग गई। उसके घर में कुछ अजीब सी स्थिति बन गई थी….एक तरफ गौरी के सफल होने की खुशी तो दूसरी तरफ उसके भाई के न पास होने का गम। किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि जिससे उम्मीद लगाए बैठे वो असफल रहा और जिससे कोई आस न थी वह सफल रही। आखिर नियति क्या सिखाना चाहती थी …
गाँव के कुछ लोग जो कभी ताने देते थे, वे अब चौंक कर उसकी तरफ देखते थे — कुछों के चेहरों पर शर्म मिली, कुछों पर हैरानी, और कुछों ने तो तालियाँ भी बजाईं।
और नतीजा यह निकला कि गौरी पहले प्रयास में उत्तीर्ण ही नहीं हुई बल्कि अच्छी रैंकिंग लाने में भी सफल हुई। आज उसी गौरी के स्वागत के लिए घरवाले और मुहल्ले वाले पलकें बिछाए बैठे हैं। नतीजा निकलने के चार दिन पहले ही बुआ उसे अपने घर का काम करवाने को लेकर गई थीं और जब अम्मा ने फोन पर रिजल्ट बताया तो बुआ फौरन अटैची पकड़ पीछे पीछे चलती आई यह कहते हुए कि “मैं कहती थी न कि एक दिन मेरी गौरी बिटिया जरूर डाॅक्टर बनेगी।”
बात यहीं खत्म नहीं होती….अपनी आंखों में सुनहरे सपने लिए वो आगे की पढाई करने गांव से शहर आ गई। वहां उसे हास्टल मिलने में ज्यादा वक्त नहीं लगा…अम्मा की वापसी और भाई की अगली बार की तैयारी का दौर शुरू हो चुका था।
इधर बड़े शहर के अस्पताल में जब उसकी पढ़ाई शुरू हुई, तो उसने देखा कि वहाँ रंग-रूप से ज्यादा ज्ञान और संवेदना की कदर होती है। वहाँ के प्रोफेसर, सहपाठी और मरीज — सब ने उसे अपनी क़ाबिलियत से आँका। आस ने हर क्लास, हर प्रैक्टिकल में अपना सर्वश्रेष्ठ दिया। उसने सख्ती के साथ मानवता की भी कसौटी सीखी मरीज की तकलीफ सुनना, स्नेह देना, और रोग का समाधान ढूँढना यह सब उसकी असली परीक्षा थी।
समय के साथ गौरी की पहचान केवल ‘काली लड़की’ के रूप में नहीं रही। वह ‘डॉक्टर गौरी’ बन गई एक ऐसा नाम जिसने उसके गाँव के लोगों के दिलों में सम्मान बिठाया। वह अब गाँव आती तो लोग उसकी बातें सुनते, उसकी सलाह लेते और गर्व से कहते “हमारी गौरी ने गाँव का नाम रोशन किया।”
कुछ लोगों ने खुले मन से माफी माँगी — पर गौरी ने कहा, “माफी की ज़रूरत नहीं। मैं चाहती हूँ कि हम आगे बढ़ें। बच्चों को बताइए कि मेहनत और चाहत से सब कुछ संभव है।”
फिर तो गौरी के खुद को साबित करने के दिन आ गए। एक बार गाँव में एक बच्ची को जलने की गंभीर चोट आ गई। फौरन उसे बुलाया गया। वह दौड़ी आई, न सिर्फ़ इलाज किया बल्कि माँ-बाप को समझाया कि जलने के बाद की देखभाल कैसे होगी। उसने उस बच्ची को प्यार से पट्टी बाँधी, उसका दुख बाँटा और धीरे-धीरे गाँव में डॉक्टर के रूप में उसकी छवि और भी अधिक पक्की हुई। वही बच्ची जब ठीक हुई, तो उसके परिवार ने गाँव में गौरी के सहायता की कहानी लोगों को सुनाई — और धीरे-धीरे, वे ताने जो कभी उसे मिलते थे, उसकी जगह अब वह देवीतुल्य हो गई ।
गौरी ने न केवल अपना चिकित्सा ज्ञान गाँव में बाँटा, बल्कि उसने लड़कियों के लिए एक छोटी क्लिनिक और लाइब्रेरी भी बनवाई । वहाँ वह मुफ्त में स्वास्थ्य शिक्षा, स्वच्छता के उपाय, और पढ़ाई की सामग्री देती। उसकी लाइब्रेरी में एक कोना “आत्म-विश्वास का कोना” कहलाता — जहाँ वह लड़कियों को प्रेरित करती, उन्हें स्टडी प्लान बनाकर देती और कहती, “तुम्हें अपने सपनों को पंख देना है तुम्हारी कहानी आकाश छूने से शुरू होती है”
समय के साथ आस के गाँव की सोच बदली। कुछ लोग अभी भी पुरानी धारणाओं में फंसे रहते थे, पर नए बच्चे जिनको गौरी ने मेडिकल पढ़ाई के सपने दिखाए थे, वे रंग-भेद से ऊपर उठकर अपने हुनर और मेहनत से खुद को परखने लगे। आस ने महसूस किया कि एक व्यक्ति की जीत कितनी दूर तक असर कर सकती है — सिर्फ़ एक जीवन सुधरता नहीं, कई पीढ़ियाँ बदल सकती हैं।
एक शाम जब गौरी गाँव के मैदान में बैठी थी, आसमान गुलाबी था….उसके पास वही बच्ची — अब बड़ी होकर लड़की — पढ़ते हुए बैठी थी। गौरी ने लड़की की पृष्ठभूमि में झांकते हुए कहा, “मेरे सारे ज़ख्म मुझे सिखाते रहे — दर्द ने मुझे संवेदनशील बनाया, ताने ने मुझे मजबूत, और विश्वास ने मुझे आगे बढ़ाया।” लड़की ने चुपचाप उस बात को अपनाया और आँखों में चमक लिए बोली, “डॉक्टर साहब, मुझे भी डॉक्टर बनना है।” गौरी ने मुस्कुरा कर कहा, “तुम बनोगी — बस अपने सपने को पंख देना और अपनी सतरंगी रौशनी से दुनिया को रंग देना।”




