विशेष

हां, वह बच्ची बड़ी हो गई है…।

एक छोटी-सी बच्ची

जो कभी फूलों की तरह खिलखिलाती थी, मुस्कराती थी

वह आज ऐसी सयानी हो गई कि मुस्कराना भूल गई…।

जो कभी चिड़िया-सी चहचहाती थी,

आज वह गंभीर है, मुस्कराना भूल गई है,

हां, वह बच्ची बड़ी हो गई है…।

 

लड़कपन में घर-परिवार का बोझ बंटाकर

खुद को निखारा, भाई-बहनों की जिम्मेदारियों को संभाला।

किसी दूसरे के नाम से जाना, जाना न था उसे गवारा

मेहनत कर पढ़ी, पहचान बनाई खुद की,

गुड़िए-गुड्डी का खेल खेलने वाली वह बच्ची,

अब डोली में विदा होकर ससुराल चली गई है,

हां, वह बच्ची बड़ी हो गई है…।

 

उसने दुनिया की नजरों में खरी उतरने की ठानी,

समाज को समझाई अपने अस्तित्व की अहमियत

वह कभी हारी नहीं, कभी थकी नहीं, कभी रुकी नहीं,

गृहस्थी संभाली, परिवार संभाला, रिश्तों को संभाला,

दीप की तरह जल-जलकर नया रास्ता खोज निकाला

खुद तो सीखा ही, औरों को भी सिखाया

अब अनुभवी होकर घर-परिवार की मुखिया बन गई है,

हां, वह बच्ची बड़ी हो गई है…।

‘अश्मिता सक्सेना’

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