कविता – ‘अपना संवत्सर आया है’


अब प्रकृति सुन्दरी सँवर उठी,
नव रूप निखर कर छाया है ।
आओ नववर्ष मनायें हम,
अपना संवत्सर आया है ।।
सब धुन्ध गई कुहरा गायब,
तन की ठिठुरन सब दूर हुई ।
जो छुपे हुए थे शीतग्रसित,
उनकी सब सिहरन दूर हुई ।।
मौसम ने अब करवट ली है,
अनुकूल हुआ मुसकाया है ।।
आओ नववर्ष मनायें हम,
अपना संवत्सर आया है ।।
सतरंगी प्रकृति सजी अपनी,
कलियां बन फूल मुस्कराईं ।
यह अमलतास हो या पलाश,
निज रंगत सबने दिखलाईं ।।
श्रृंगार किए सब झूम रहे,
दुल्हन सा रूप सजाया है ।।
आओ नववर्ष मनायें हम,
अपना संवत्सर आया है ।।
मटर चना गेहूँ अरहर को,
पके देख सब जन हैं हर्षित ।
फसलें पक तैयार हुईं हैं,
प्रमुदित हैं, मन हैं उत्कर्षित ।।
सब प्रसन्न हैं यही समय जब,
घर-घर खुशहाल बनाया है ।।
आओ नववर्ष मनायें हम,
अपना संवत्सर आया है ।।
जिसमें जिसको भी खुशी मिली,
उसने नव वर्ष मनाया है ।
यह देवभूमि भारत अपनी,
देवों ने स्वर्ग बनाया है ।।
हमने सब का सम्मान किया,
सब को ही गले लगाया है ।।
आओ नववर्ष मनायें हम,
अपना संवत्सर आया है ।।
चैत्र शुक्ल की प्रथमा को,
नव दुर्गा का आह्वान करें ।
माँ दुर्गा शक्ति सभी को दें,
नवनिधि दें शक्ति प्रदान करें ।।
जय हो जय हो जय माता दी,
सारे नभ में स्वर छाया है ।।
आओ नववर्ष मनायें हम,
अपना संवत्सर आया है ।।
-निर्भय नारायण गुप्त ‘निर्भय‘




